Friday, April 29, 2011

कितना रंग लाएगी मुख्य न्यायाधीश की सलाह


मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि हमें काली पोशाक में ईमानदार व्यक्ति चाहिए, जो न्यायपालिका की स्वतंत्रता और ईमानदारी को बरकरार रखे। जजों को आत्मसंयम बनाए रखना चाहिए और वकीलों, राजनीतिक दलों, नेताओं से उनका संपर्क विशुद्ध रूप से सामाजिक अवसरों के सिवाय नहीं होना चाहिए..सद में न्यायिक मानक व जवाबदेही विधेयक पेश किया जा चुका है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीशों केविरुद्ध शिकायतों की जांच करने, समुचित कार्रवाई करने और न्यायाधीशों के लिए कोड ऑफ कंडक्ट यानी आचरण संहिता की व्याख्या शामिल है। उधर देश के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एसएच कपाड़िया ने भी कोड ऑफ कंडक्ट का नाम लिए बिना न्यायाधीशों को आत्म नियंत्रण के सुझाव दिए हैं और कहा है कि जब कोई न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठता है तो उसे स्वयं कुछ पाबंदियां लगा लेनी चाहिए, न्यायाधीश का एकमात्र कर्तव्य समाज के प्रति जवाबदेही है, उसे रोजाना खुद से पूछना चाहिए कि उसने ऐसा कुछ तो नहीं कहा या किया, जो उसके पद की गरिमा के अनुकूल नहीं है। एक न्यायाधीश का काम अपनी मान्यता या प्राथिमकताओं को दरकिनार कर कानून के विश्लेषण से शुरू होना चाहिए और वहीं खत्म हो जाना चाहिए। न्यायाधीश को किसी ऐसे व्यक्ति का संरक्षण हासिल नहीं करना चाहिए, जिससे वह किसी विशेष मदद या सेवानिवृत्ति के बाद किसी पद की चाहत रखता है। इससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है। जब कभी आप किसी से कुछ पाने की इच्छा रखते हैं तो वह व्यक्ति भी इसके बदले कुछ हासिल करना चाहेगा। जिस तरह न्यायाधीश केसामने उसकेपरिवार का कोई सदस्य बहस केलिए उपस्थित होता है तो यह धारणा बनती है कि इससे न्यायपालिका का कामकाज प्रभावित हो सकता है। 

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि हमें काली पोशाक में ईमानदार व्यक्ति चाहिए, जो न्यायपालिका की स्वतंत्रता और ईमानदारी को बरकरार रखे। जजों को आत्मसंयम बनाए रखना चाहिए और वकीलों, राजनीतिक दलों, नेताओं से उनका संपर्क विशुद्ध रूप से सामाजिक अवसरों के सिवाय नहीं होना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश ने अपना उदाहरण देते हुए कहा कि मैं घुलने-मिलने से बचता रहा हूं, यहां तक कि किसी गोल्फ क्लब की सदस्यता भी नहीं ली, क्योंकि इससे मुझे वकीलों व राजनेताओं आदि से रोज मिलना होगा, जिसका लोगों पर गलत असर पड़ेगा। मुख्य न्यायाधीश कपाड़िया का कहना है कि सामुदायिक संस्थानों में न्यायाधीशों की भागीदारी से भी गलत धारणा बनती है। जब उस संस्थान से जुड़े सदस्य उसी न्यायाधीश के सामने याचिकाकर्ता बनते हैं, न्यायायिक या सामाजिक क्षेत्र केलोगों से, जो भविष्य में याचिकाकर्ता बन सकते हैं, न्यायाधीश केमेलमिलाप से दूसरों के मन में न्याय केप्रति शंका पैदा हो सकती है। ऐसा सोचा जा सकता है कि न्यायाधीश अपने कर्तव्य को पूरा करने में इन लोगों को लाभ पहुंचा सकते हैं। ऐसे में न्यायाधीश की जिम्मेवारी बनती है कि वे निष्पक्ष और भयरहित होकर व अपने लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए स्वतंत्र न्याय को जिंदा रखें। एक न्यायाधीश को समाज से थोड़ी दूरी बनाकर रखने की कोशिश करनी चाहिए और उसे वकीलों, किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल, उनकेनेताओं, मंत्रियों से संबंध नहीं बनाना चाहिए, जबतक कि वह कोई सामाजिक जलसा न हो। 

मुख्य न्यायाधीश ने कहा है कि अपना काम करते वक्त जजों को समाज को उपदेश नहीं देना चाहिए और विधायिका की बुद्धिमता का आकलन नहीं करना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश कहते हैं कि उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय सिद्धांतों की अदालतें हैं। जजों को मामले से जुड़े सिद्धांतों के अलावा किसी और विषय पर नहीं बोलना चाहिए। लेकिन समस्या यह है कि कभी-कभी न्यायाधीश अपने मूल्यों, अपनी पसंद और नापसंद को समाज पर थोप देते हैं। जबकि जजों को इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि हमें संवैधानिक सिद्धांतों के लिए काम करना है। मुझे यह कहने का कोई अधिकार नहीं है कि दूसरों को क्या करना चाहिए, लेकिन मुझे संवैधानिक सिद्धांतों पर अपने कर्तव्यों का निर्वाह करना है। उन्होंने कहा कि मेरा मानना है कि अगर न्यायाधीश सिद्धांतों के आधार पर अपने फैसले करते हैं तो अनेक वर्तमान विवाद पैदा ही नहीं होंगे।

न्यायाधीशों को कोई भी महत्वपूर्ण फैसला सुनाने से पहले न्यायिक शक्तियों का ख्याल रखना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को संविधान की मूल भावनाओं पर गौर करना चाहिए। कार्यपालिका से संबंधित कोई भी निर्णय देने से पहले उन्हें अपनी सामाजिक और आर्थिक मान्यताओं को दरकिनार कर देना चाहिए। कार्यपालिका का काम कानून लागू करना होता है। किसी कानून की जरूरत, उसे लागू करने के समय को लेकर हमें चिंतित नहीं होना चाहिए। किसी कानून की भावना के नाम पर न्यायपालिका को सुपर कार्यपालिका बनने से इनकार कर देना चाहिए। हमें इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि संविधान में सभी धड़ों की शक्तियों का बंटवारा किया गया है। संसद और सरकार को किसी कानून के लिए जवाबदेह बनाया जा सकता है और मतदाता इसका फैसला करते हैं। जबकि कई जनहित याचिकाओं के जरिए अदालतें सरकार और अधिकारियों के लिए ऐसे मानक तय करती हैं, जो किसी कानून के दायरे से बाहर होता है। साथ ही अदालतों को कानून और गवर्नेस की बारीक रेखा की समझ होनी चाहिए। साथ ही अदालतों को यह भी देखना चाहिए कि ऐसे मामलों में कानूनी पहलू है या राजनीतिक पहलू। कानूनी पहलू होने पर ही अदालतों को हस्तक्षेप करना चाहिए। 

Friday, April 22, 2011

स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के प्रतिकूल है एहतियातन हिरासत


सुप्रीम कोर्ट ने निवारक निरोध यानी एहतियातन हिरासत (प्रीवेंशन डिटेंशन) पर ऐतिहासिक व्यवस्था देते हुए कहा है कि यह संविधान प्रदत्त नागरिकों के स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के प्रतिकूल है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देश के सामान्य कानून संदिग्ध अपराधियों के विरुद्घ कार्रवाई करने के लिए पर्याप्त हैं और निवारक निरोध में लिए जाने जैसे कदम अस्वीकार्य हैं, क्योंकि इसमें बिना उचित मुआवजे के नागरिकों को जेल में रखा जाता है। न्यायमूर्ति मरकडेय काटजू, न्यायमूर्ति ज्ञान सुधा मिश्र और न्यायमूर्ति एमएस निज्जर की तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि निरोधात्मक हिरासत संबंधी कानून का प्रयोग विशेष परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए, क्योंकि यह स्वतंत्रता संबंधी नागरिकों के मूल अधिकार के खिलाफ है। इस कानून के तहत किसी भी संदिग्ध व्यक्ति को अदालती सुनवाई के बगैर, उसका गुनाह बताए बिना हिरासत में लिया जा सकता है या उसे गिरफ्तार किया जाता है। हमारे देश में इसका अस्तित्व ब्रिटिश शासनकाल से ही है। स्वतंत्र भारत में भी इसे अपना लिया गया।

दरअसल, संविधान के अनुच्छेद 22 के तहत राष्ट्रीय सुरक्षा और शांति व्यवस्था बनाए रखने के आधार पर किसी भी व्यक्ति को बिना कोई आरोप लगाए तीन महीने तक हिरासत में रखने का प्रावधान है। पीठ ने कहा, ‘एहतियातन हिरासत अपनी प्रकृति से लोकतांत्रिक विचारों के विरुद्घ और विधि के शासन के लिए अभिशाप है। युद्घकाल को छोड़कर अमेरिका और इंग्लैंड में इस तरह का कोई कानून नहीं है।न्यायमूर्ति काटजू ने अपने फैसले में कहा, ‘चूंकि संविधान का अनुच्छेद 22 एहतियातन हिरासत में लेने की अनुमति देता है, इसलिए हम इसे अवैध नहीं ठहरा सकते, लेकिन एहतियातन हिरासत में लेने की शक्ति को बेहद संकीर्ण सीमा में कैद करना होगा अन्यथा हम संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त स्वतंत्रता के महती अधिकार को छीनेंगे, जिसे लंबे कठिन और ऐतिहासिक संघर्ष से जीता गया है।पीठ ने यह टिप्पणी उपयोग की अवधि समाप्त हो चुकी दवाओं को बेचने के आरोपी रामकृष्णन की पत्नी रेखा की ओर से दायर अपील को बरकरार रखते हुए की। रेखा ने याचिका में तमिलनाडु सरकार द्वारा पति को एहतियातन हिरासत में रखने को चुनौती दी थी।

पीठ ने कहा कि प्रिवेंटिव डिटेंशन जैसा कानून यूएसए और इंग्लैंड में नहीं है। यह सही है कि संविधान के अनुच्छेद-22 (3) (बी) में प्रिवेंटिव डिटेंशन का प्रावधान है, हम उस पर टिप्पणी नहीं कर रहे, लेकिन हमें यह तय करना होगा कि इसके तहत दिए गए अधिकार को सीमित किया जाना चाहिए। अगर ऐसा नहीं किया गया तो संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत दिए गए व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार दूर चला जाएगा। 

ज्ञातव्य है कि संविधान के अनुच्छेद 22 के खंड 3 से 7 परंतुकों या अपवाद खंडों के रूप में हैं और वे किसी कानून के अधीन निवारक निरोध के मामलों में लागू होते हैं। परिभाषा के अनुसार निवारक निरोध किसी गैर-कानूनी कार्य को रोकने के लिए होता है, न कि किसी गैर-कानूनी कार्य हेतु किसी व्यक्ति को दंड देने के लिए। अनुच्छेद 22 संसद को निवारक निरोध का उपबंध करने वाला ऐसा कानून बनाने का अधिकार देता है, जिसमें यह निर्धारित किया गया हो कि किसी व्यक्ति को किन परिस्थितियों में, किस वर्ग के मामलों में, अधिक से अधिक कितनी अवधि के लिए निरुद्घ किया जा सकता है। उसमें सलाहकार बोर्ड की स्थापना और उसकी प्रक्रिया भी शामिल है। टी. देवकी बनाम तमिलनाडु सरकार में सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि यदि राज्य सरकार संतुष्ट हो कि किन्हीं शराब, मादक द्रव्यों अथवा वन संपदा के तस्करों, गुंडों, अनैतिक व्यवहार में लगे अपराधियों अथवा झुग्गी-झोपड़ियों की जमीन हथियाने वालों को कानून और व्यवस्था में व्यवधान न डालने देने के लिए बंदी बनाना जरूरी है तो उसके आदेश दे सकती है। निवारक निरोध के अधिकार के संभावित दुरुपयोग के विरुद्घ संरक्षण के रूप में कतिपय उपायों का उपबंध किया गया है। अत: निवारक निरोध को तीन महीने से अधिक अवधि के लिए विधि द्वारा अधिकृत नहीं किया जा सकता, जबतक कि सलाहकार बोर्ड उसके लिए पर्याप्त कारण नहीं देखता। 

संसद ने निवारक निरोध अधिनियम, 1950 पारित किया था, जो भारत में निवारक निरोध की विधि गठित करता था। यह एक अस्थाई अधिनियम था, जो प्रारंभ में केवल एक वर्ष केलिए ही था। तबसे इस अधिनियम की अवधि अनेक बार बढ़ाई गई। यह 1969 केसाथ ही समाप्त हो गया। जब पुन: अराजकतावादी तत्वों ने जोर पकड़ा तो आंतरिक सुरक्षा अधिनियम नाम से एक नया अधिनियम 1971 में बनाया गया। इसके उपबंध मोटे तौर पर निवारक निरोध अधिनियम, 1950 के समान ही थे। 1974 में संसद ने विदेशी मुद्रा संरक्षण और तस्करी निवारण अधिनियम, 1974 पारित किया। यह 1971 के अधिनियम का आर्थिक अपराधों के लिए अनुपूरक था। आंतरिक सुरक्षा अधिनियम, विध्वंसात्मक कार्यो के विरुद्ध था। 1974 के अधिनियम का उद्देश्य तस्करी, विदेशी मुद्रा में छल आदि असामाजिक कार्य रोकना था। 1978 में आंतरिक सुरक्षा अधिनियम निरासित कर दिया गया, किंतु 1974 का अधिनियम विमान है। राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 और चोर बाजारी निवारण और आवश्यक वस्तु प्रदाय अधिनियम, 1980 बनाकर केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को यह शक्ति सौंपी गई|

खापों की खैरियत नहीं


देश की सबसे बड़ी अदालत ने खाप पंचायतों की दादागीरी पर लगाम लगाने का ऐतिहासिक फैसला लेकर तमाम मासूमों की जान बचा ली है। सुप्रीम कोर्ट ने ऑनर किलिंग को बर्बर बताते हुए, इनको सख्ती से बन्द करने का आदेश दिया है। जस्टिस माकर्डेय काटजू और ज्ञानसुधा मिश्रा की खंडपीठ ने इनको अवैध बताया और कहा कि इस ज्यादती को रोकने में विफल रहने वाले प्रशासनिक व पुलिस अधिकारियों को निलंबित किया जाए। 1500 वर्षो से पारंपरिक रूप से चली आ रही ये पंचायतें जाति व धर्म की आड़ में युवा प्रेमी जोड़ों को जान से मारने या ऐसी धमकी देने के लिए अकसर र्चचा में आती रही हैं। सरकारें अब तक इनके इन वीभत्स कारनामों पर मौन साधे रही हैं, क्योंकि उनको अपना वोट बैंक ज्यादा प्यारा है। बेंच के इस फैसले का असर सीधे युवाओं पर नजर आयेगा, साथ ही वो अपराध भी रुकेंगे, जिन पर पंचायतें हास्यास्पद फैसले सुना दिया करती हैं। ताजा खबर है कि 5 साल की बच्ची का रेप करने वाले युवक को ऐसी ही पंचायत ने बस 5 चप्पलें मार कर छोड़ दिया। बच्ची की तो जान भी चली गई पर उसके मां-बाप को पुलिस में शिकायत नहीं दर्ज कराने दी गयी। दो दिन पहले राजधानी से सटे भिवानी में एक बलात्कारी ने अपने परिवार की दो विधवाओं को चरित्रहीन बता कर सरेआम मार डाला। कानून को अपने हाथ में लेने की उतावली और इज्जत की आड़ में कमजोर वर्ग/जाति का शोषण किसी से छिपा नहीं है। यह सच है कि व्यवस्थागत ढिलाई के कारण कानून-व्यवस्था उन दूर-दराज के इलाकों तक नहीं पहुंचती, जहां आज भी सामंती सोच हावी है। आम आदमी बहुत निर्धन है, वह अंगूठाटेक है, उसको खाने के लाले हैं और गांव-घर से जबरन निकाले जाने का भय उसको इन पंचायतों के आगे घुटने टेकने को मजबूर करता रहा है। ऑनर किलिंग की आड़ में इन पंचायतों के सामंती फरमान वैसे ही रुकेंगे, जैसे सती प्रथा को रोका जा सका है। एक तरफ हम बार-बार आजादी और निजता के कसीदे काढ़ते हैं, दूसरी तरफ प्रेम करने वाले नवयुवाओं को सरेआम फांसी पर लटकाये जाने के वीभत्स पंचायती फैसले दिल दहला जाते हैं। ग्रामीण परिवेश में पंचायतों की भूमिका कभी सकारात्मक भी रही है, जिन्हें प्रेमचंद के शब्दों में पंच परमेश्वर माना जाता था, जिनका आस-पास के गांवों में सम्मान हुआ करता था। लेकिन उनके अमानवीय फरमानों ने दिल-दहलाऊ हरकतों द्वारा उन लोगों का जीना मुश्किल कर दिया, जिनके लिए 'अभी दिल्ली दूर है।' अदालत के इस फैसले से सिर्फ प्रेमीजन ही चैन की सास नहीं ले रहे होंगे बल्कि प्रशासन और पुलिस को भी अपनी मुस्तैदी चुस्त करने की कवायद शुरू कर देनी पड़ी होगी। जिसको गुनाह के बाद झकझोर कर उठाया जाता रहा है, वे अपने सूचना तंत्र को कैसे पुख्ता करते हैं, यह तो उनको स्वंय ही सोचना होगा।

Thursday, April 21, 2011

देश में दो भारत नहीं हो सकते


नजीर कैसे बने भारतीय न्यायपालिका


लोकपाल और जन लोकपाल की संस्था स्थापित करने और उसे उच्च न्यायपालिका की नुक्ताचीनी का अधिकार देने-न देने की कश्मकश के बीच देश के मुख्य न्यायाधीश द्वारा लोकतंत्र की इस ढाल को उसका कर्तव्य याद दिलाकर उस पर पानी चढ़ाने की कोशिश स्वागत योग्य और समीचीन है। ऐसे मुकाम पर जब अन्ना हजारे जजों को लोकपाल की पकड़ से मुक्त रखने की वकालत करके ड्राफ्टिंग कमेटी के अपने साथियों से मतभिन्नता जता रहे हैं, देश के चीफ जस्टिस एसएच कपाडि़या ने काले परिधान के बावजूद न्यायपलिका की छवि बेदाग रखने वाले लोगों की जरूरत पर जोर दिया है। देश के सर्वोच्च न्यायिक अधिकारी द्वारा अपने साथी न्यायाधीशों को उनके पद की गरिमा और शुचिता की रक्षा के महत्व की याद दिलाने से जजों द्वारा आचार संहिता के पालन की आवश्यकता फिर से रेखांकित हुई है। अपनी बिरादरी को उनकी मर्यादा की यह याद न्यायमूर्ति कपाडि़या ने प्रख्यात विधिवेत्ता एमसी सीतलवाड़ स्मारक व्याख्यान करते हुए हाल में ही दिलाई है। उन्होंने कहा कि जजों को ऐसी मिसाल पेश करनी चाहिए, जिससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता बरकरार रहे, जजों का आचरण ऐसा हो कि कोई उन पर उंगली न उठा सके, वकीलों-नेताओं और राजनीतिक दलों से वे दूरी बरतें। उनके अनुसार न्यायमूर्तियों को निचली अदालतों के कामकाज में अनावश्यक दखलंदाजी से भी बचना चाहिए। जस्टिस कपाडि़या का यह भाषण एकदम सामयिक है। इसके तार हाल की उन अनेक घटनाओं से जुडे़ हैं, जिनमें न्यायपालिका पर या तो उंगली उठी है या उसकी निरपेक्षता पर आघात की कोशिश हुई है। ऐसा लगता है कि सुप्रीमकोर्ट के जस्टिस अशोक कुमार गांगुली का सार्वजनिक तौर पर राजनीतिक दलों की कार्यशैली पर टिप्पणी करना जस्टिस कपाडि़या को रास नहीं आया। उसके बाद चले लांछन-प्रति लांछन के दौर से वह आहत हैं। निश्चित तौर पर न्यायपालिका की गरिमा को इससे ठेस पहुंची थी। उसके अगले दिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जजों को अपनी गरिमा बनाए रखने की सलाह दी तो उससे एकबारगी लगा कि लोकतंत्र के दोनों स्तंभों में टकराव की नौबत न आ जाए। वह दौर न्यायपालिका की छवि की दृष्टि से आसान भी नहीं था। जजों की संपत्ति के ब्यौरे को सूचना के अधिकार के दायरे में लाने के मसले पर चली न्यायिक कवायद और मिट्टी के मोल कई एकड़ जमीन खरीदने के आरोपों से घिरे जस्टिस दिनाकरण को गुपचुप सुप्रीमकोर्ट का न्यायाधीश बनाने की तैयारी, नजारत गबन कांड और एक के बाद सर्वोच्च न्यायिक पद पर रहते हुए तीन चीफ जस्टिसों की जन्मतिथि, पु़त्रमोह और संपत्ति तथा पक्षपात के आरोपों से घिरना आदि चंद ऐसी बदनुमा घटनाएं हैं, जो भारतीय न्यायपालिका के गौरवमय इतिहास में कलंक के तौर पर दर्ज हो गई हैं। जस्टिस कपाडि़या के भाषण में इन मसलों से घिरी न्यायपालिका की प्रतिष्ठा बचाने की आतुरता है। उन्होंने जब यह कहा कि जज का काम कानून के दायरे में रहकर न्यायिक समीक्षा करना है तो इसका निहितार्थ शायद यही रहा होगा कि नेताओं जैसा व्यवहार करने से जज बाज आएं, राग-द्वेष से परे रहकर सिर्फ कानून की दृष्टि से सोचें, नेता या पुलिस की तर्ज पर व्यवहार करने की चाहत पर लगाम लगाएं। वह योर ऑनर हैं, तबादले कराने और परमिट दिलाने वाले आम इंसान नहीं! लोगों की जिंदगी का फैसला करने वाले ईश्वर की तरह विशिष्ट और निर्गुण-निराकार हैं। वह जन्म के नियामक भले न हों, पर न्याय की तराजू पर इंसान के कर्मो को तौलकर उसके भविष्य कभी-कभी तो उसकी मृत्यु का फैसला भी न्यायमूर्तियों को करना होता है। पिछले दिनों जजों के खिलाफ अदालतों में आई मुकदमों की बाढ़ और नागरिक समाज में छिड़े अभियानों की बाढ़ के लिए चीफ जस्टिस ने उन्हीं की मेलजोल की प्रवृत्ति को यह कहकर आडे़ हाथों लिया कि किसी समुदाय का हिस्सा बनने से जजों को परहेज रखना चाहिए। इन समुदायों के लोग जब अकसर पैरोकार के तौर पर अदालत में आने लगें तो इससे जजों और जुडिशरी की साख घटती है। कहीं उनका इशारा चंद ऐसे वकीलों से जजों के ताल्लुकात की तरफ तो नहीं था, जो जजों के खिलाफ मुखर हैं। जाहिर है कि न्यायपालिका के सख्ती से बंद दरवाजों की दरारों में से ही ऐसे तथ्य बाहर जाते होंगे। वैसे भी जब जन लोकपाल के मामले में पूरा देश जागा हुआ है तो जस्टिस कपाडि़या का यह बयान बेहद अहम है। उन्होंने कहा कि जजों को राजनेताओं, राजनीतिक दलों, वकीलों आदि से दूरी बरतनी चाहिए, बशर्ते कोई निहायत सामाजिक अवसर न हो। जस्टिस कपाडि़या के इस भाषण के संदर्भ में न्यायाधीशों के लिए आचार संहिता की जरूरत साफ तौर पर महसूस की जा सकती है, लेकिन आश्चर्य है कि ऐसी कोई ठोस आचार संहिता न्यायपालिका में मौजूद नहीं है। कुछ ऐसे नियम हैं, जिन पर उनसे चलने की उम्मीद की जाती है। दुनिया के अनेक लोकतांत्रिक देशों में जजों के लिए कमोबेश ऐसी ही अलिखित आचार संहिताएं है। जज कभी राजनीतिक कार्यक्रमों में नहीं जाते। सार्वजनिक टिप्पणी नहीं करते। प्रतिष्ठित जज तो सार्वजनिक कार्यक्रमों में ही नहीं, पारिवारिक कार्यक्रमों में भी बहुत सोच-समझकर शिरकत करते हैं। वह ऐसे किसी व्यक्ति के साथ फोटो नहीं खिंचवाते, जिससे वह बखूबी परिचित न हों या परिचय के बावजूद उन्हें यह लगे कि वह उनकी तस्वीर का अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए इस्तेमाल नहीं करेगा। पार्टियों में नहीं जाते। क्लब नहीं जाते। लोगों से मेलजोल नहीं बढ़ाते। अब तो सुप्रीमकोर्ट जजों की संपत्ति के ब्यौरे में कंपनियों के शेयरों आदि का जिक्र है, पर कायदे से जजों को इससे भी परहेज रखना चाहिए। जजों से यह उम्मीद की जाती है कि वह अपने फैसलों के बारे में न बोलें, उनका तो फैसला ही बोलता है। न्यायिक बिरादरी में आज भी ऐसे जजों की कमी नहीं जो फीता काटने में विश्वास नहीं रखते। रिटायर होने पर आयोगों के अध्यक्ष बनकर जीवनभर सत्ता और बंगले का सुख लूटना जिन्हें पसंद नहीं है। सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्ट के जजों को कभी गाड़ी और बंगला तक नहंीं मिलता था। पर अब उन्हें पहले किए गए आतिथ्य के लिए सत्कार भत्ते का एरियर लेने में भी संकोच नहीं होता। पद और आयोग का मोह न करने वाले जजों में उस दौर के काफी जज हैं। कहते हैं न कि अपनी इज्जत अपने हाथ। न्यायपालिका पर टिप्पणियों का जो सिलसिला इन दिनों बढ़ा है, उसकी वजह यही है कि जज धैर्य खोने लगे हैं। जस्टिस वी रामास्वामी पर महाभियोग नहीं हो पाया, पर दुनिया को तो यह अहसास हो ही गया कि जज भी हाड़-मांस के बने हुए हैं। उनमें भी वैसे ही लिप्सा है। न्यायपालिका की साख तो ऐसे ही गिरनी शुरू हुई। जजों के चाल-चरित्र और चेहरे पर विपरीत टिप्पणियां करने का चलन इसलिए बढ़ रहा है, क्योंकि ब्रिटेन से हमने न्यायपालिका का जो गौरवमयी मॉडल अपनाया था, वह अपनी आभा खो रहा है। पूरी दुनिया में भारतीय न्यायपालिका बेमिसाल रही है। सुप्रीमकोर्ट के किसी जज पर महाभियोग का इकलौता प्रस्ताव आना इसकी तसदीक भी करता है। पांच वर्ष पहले बांबे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एके भट्टाचार्जी ने किसी बड़े विदेशी प्रकाशन द्वारा छापी गई उनकी किताब के एवज में मोटी रॉयल्टी मिलने के सवाल पर पद छोड़ दिया था। जस्टिस भट्टाचार्जी का करियर बेदाग रहा था और वह बहुत आगे जाते, पर न्यायपालिका के ऊंचे मानदंडों की रक्षा की खातिर उन्होंने पद त्यागना बेहतर समझा। न्यायपालिका का इतिहास ऐसे किंवदंती से लगने वाले बेहिसाब किस्सों से पटा हुआ है। पहले न्यायिक दौरों पर जाने वाले जज आने-पैसे का हिसाब रखते थे और अब तो उनकी आवभगत और मेमसाब-बेबी जी के लिए खरीदारी मातहत जजों की ड्यूटी है। इन तुच्छ बातों से ही न्यायपालिका की इज्जत पर असर पड़ा है। ऐसे न्यायाधीशों की संख्या बढ़ गई है, जिनका न्यायपालिका के ऊंचे मानदंडों से सरोकार नहीं है। वह इसे अफसरी मानते है। उन्होंने बिसरा दिया है कि आदर्श जज का जीवन संत जैसा होना चाहिए। वह मनुष्य हैं, इस नाते उनके लिए जुडिशियल बिरादरी है। इसी से उन्हें परिवार और समाज का सुख मिलेगा। मनोरंजन भी यहीं ढूंढ़ना है। पर जज अपनी बिरादरी से बाहर निकलने को आतुर हैं। अस्सी के दशक में किसी ऑटोमोबाइल व्यापारी के महरौली फार्महाउस की एक पार्टी से शुरू हुई जजों की बदनामी आज चौराहे पर है। ऐसे में योर ऑनर न्याय के मंदिर पर उठती उंगलियों के निहितार्थ से लोकतंत्र की इस सबसे मजबूत ढाल को बचाने के लिए उस पर फिर से पानी चढ़ाने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया। (लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं).

Monday, April 18, 2011

नागरिक समाज की जीत


लेखक विनायक सेन को जमानत दिए जाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को न्यायपालिका की साख के लिए महत्वपूर्ण मान रहे हैं

सुप्रीम कोर्ट ने मशहूर मानवाधिकार कार्यकर्ता व चिकित्सक विनायक सेन को जमानत देकर न्यायपालिका की लाज रख ली है, वर्ना जिस तरह छत्तीसगढ़ की एक निचली अदालत ने 24 अगस्त 2010 को विनायक सेन को देशद्रोही करार देते हुए उन्हें आजीवन कारावास की सजा दी थी उससे न्यायपालिका की साख पर ही बट्टा लगा था और उसके खिलाफ देशभर में बेचैनी देखी गई थी। देश के नागरिक समाज ने रायपुर के सत्र न्यायालय के फैसले को न्यायिक अन्याय माना था और उसके विरुद्ध देशभर में विरोध प्रदर्शन किया था। कहने की जरूरत नहीं कि सुप्रीम कोर्ट का 15 अप्रैल 2011 का फैसला नागरिक समाज की जीत है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है, नक्सल साहित्य रखना देशद्रोह का सबूत नहीं है। भारत लोकतांत्रिक देश है और यहां कोई यदि नक्सलियों से सहानुभूति रखता है तो इसका यह मतलब नहीं कि वह देशद्रोह का दोषी है। यही बात देश का नागरिक समाज लगातार कह रहा था। विनायक सेन को जमानत देने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से निश्चित ही न्यायपालिका की खोती साख को गिरने से बचाने में मदद मिलेगी। वैसे उसकी साख गिरने के कई कारण रहे हैं। उन्हीं में एक ठोस कारण रायपुर के सत्र न्यायालय का फैसला भी था। रायपुर के सत्र न्यायालय के पास एक भी ठोस साक्ष्य नहीं था जो यह साबित करता कि विनायक देशद्रोही हैं। चिट्ठी पहुंचाने या कम्युनिस्ट साहित्य रखने की बिना पर यदि लोगों को देशद्रोही करार दिया जाए तो सबसे पहले महाश्वेता देवी, अरुंधति राय, नामवर सिंह, मैनेजर पांडे जैसे लेखक और सभी वाम दलों के पोलित ब्यूरो के कई मशहूर सदस्य और पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा व केरल के मुख्यमंत्री इसके आरोपी होंगे। क्या महज चिट्ठी पहुंचाने के जुर्म में क्या किसी को आजीवन जेल की सजा हो सकती है? यह सवाल देश के लोकतंत्रपसंद लोगों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों को बेचैन किए हुए था। नागरिक समाज की बेचैनी की सबसे बड़ी वजह यह थी कि वह इससे पूरी तरह सहमत था कि विनायक सेन को षड्यंत्रपूर्वक फंसाया गया है। छत्तीसगढ़ की रमन सिंह की सरकार विनायक सेन से इसलिए चिढ़ी हुई थी, क्योंकि उन्होंने सलवा जुडूम का विरोध किया था। तो क्या विनायक द्वारा सलवा जुड़ूम अभियान के तहत 640 गांवों के आदिवासियों के विस्थापन का तीव्र प्रतिवाद किए जाने के कारण ही रमन सिंह की सरकार ने उन्हें झूठे मामलों में फंसाया? क्या विनायक की जनतांत्रिक आवाज को दबाने के लिए ही छत्तीसगढ़ सरकार ने माओवाद समर्थक होने का आरोप लगाते हुए 2007 में भी उन्हें गिरफ्तार किया था? तब दो साल साधारण कैदियों से भी बदतर स्थितियों में रहने के बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा जमानत मिलने पर ही विनायक की रिहाई हो पाई थी। 24 मई 2007 को गिरफ्तार किए गए विनायक पर मुकदमा सितंबर 2008 से चलना शुरू हुआ और सुप्रीम कोर्ट ने यदि उन्हें जमानत देते हुए यह न कहा होता कि इस मुकदमे का निपटारा जनवरी 2011 तक कर दिया जाए तो छत्तीसगढ़ सरकार की योजना थी कि मुकदमे को कई साल चलाया जाए और विनायक जेल में ही पड़े रहें। सरकार की वह कोशिश तो पूरी नहीं हुई, किंतु दूसरी साजिश यानी निचली अदालत से सरकार के गठबंधन को अमली जामा पहनाने में वह सफल हो गई थी। विनायक उन चुनिंदा लोगों में शुमार हैं जिन्हें 140 देशों की ज्यूरी ने 2008 में स्वास्थ्य व मानवाधिकारों के लिए जोनेथम मन अवार्ड के लिए चुना था। विनायक सेन 25 वषरें से एक चिकित्सक की भूमिका के अलावा आदिवासियों को कुपोषण व गरीबी से मुक्त करने के लिए रचनात्मक कार्य कर रहे थे। वह पीयूसीएल के पदाधिकारी के नाते मानवाधिकारों के लिए लड़ रहे थे। उन्हें सोची-समझी साजिश के तहत रायपुर के सत्र न्यायालय द्वारा दंडित करने का मतलब लोकतांत्रिक स्वरों को चेतावनी देना भी था। हमें यह भी याद रखना चाहिए कि विनायक ने कभी माओवादियों की हिंसा का समर्थन नहीं किया। नागरिक समाज भी माओवादियों की हिंसा या सरकारी हिंसा का कभी समर्थन नहीं करता। विनायक को जमानत मिलने के बाद नागरिक समाज को अब इस पर बहस करनी चाहिए कि माओवाद दमन के नाम पर जन सुरक्षा अधिनियम और गैरकानूनी निरोधक कानून की आड़ में भय और असुरक्षा का जो माहौल बनाया जा रहा है उसे कैसे खत्म किया जाए? कहने की जरूरत नहीं कि छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा अधिनियम 2005 और गैरकानूनी गतिविधि कानून अपने चरित्र में ही दमनकारी हैं। राज्य और माओवाद प्रभावित जनजातीय समूहों के बीच विभिन्न नागरिक संगठनों के माध्यम से तत्काल संवाद शुरू किए जाने की जरूरत है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)


Friday, April 15, 2011

भ्रष्ट जजों पर कसेगा शिकंजा


न्यायालय के जजों के भ्रष्टाचार के कारनामों पर भी अब अंकुश लगाना संभव हो पाएगा। वे भी कानून से बच नहीं पाएंगे। केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री डॉ. एम विरप्पा मोइली ने बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर केंद्रीय विश्वविालय में आयोजित पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए कहा कि इस कार्यप्रणाली पर कार्य चल रहा है जिससे भ्रष्ट जजों पर भी कार्रवाई करना आसान हो सकेगा। 

संविधान में दिए 1964 एक्ट के तहत यह संभव हो सकेगा। कुछ बदलाव के साथ संसद में पास होने के बाद इसे कानून का रूप दे दिया जाएगा। इससे वे लोग जो पहले से भ्रष्टाचार में लिप्त हैं जज की कुर्सी पर काबिज नहीं हो पाएंगे और जो जज भ्रष्टाचार में लिप्त होंगे उन्हें बख्शा नहीं जाएगा। उन्होंने कहा कि भारतीय न्यायिक प्रक्रिया में सुधार लाने के लिए युद्ध स्तर पर कवायद चल रही है। न्यायालय में रिक्त पड़े पदों को भरने के प्रयास तेजी से किए जा रहे हैं। इसके साथ ही केंद्र सरकार ने समानांतर न्यायालय चलाने की व्यवस्था की है। राजस्थान और मध्य प्रदेश में यह काफी लोकप्रिय भी हो रहा है। ग्रामीण न्यायालय व 13वीं फाइनेंस कमीशन के लिए 5-5 करोड़ और लीगल कमीशन के लिए 7.50 करोड़ रुपए की व्यवस्था की गई है। इन तीनों व्यवस्था के तहत काफी वादों को उसी स्तर पर निपटारे में सफलता मिल रही है। यह मोबाइल न्यायालय की तरह कार्य करते हैं और काफी प्रभावी सिद्घ हो रहे हैं। प्रदेश सरकार से भी उन्होंने यह आशा की है कि वे इस व्यवस्था को अपनाने में सहयोग प्रदान करें। इसके साथ ही लोक अदालत फास्ट ट्रैक न्यायालय के तहत भी काफी लंबित वादों को निपटाया जा रहा है। कोशिश यही है कि इस न्यायिक प्रक्रिया के तहत भ्रष्टाचार के लंबित मामलों का एक वर्ष के भीतर ही निपटारा कर दिया जाए। 

दूसरी ओर केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री डॉ. एम विरप्पा मोइली ने बताया कि अब भारत का कोई भी नागरिक न्याय पाने से वंचित नहीं होगा। न्याय पाना हर किसी का अधिकार है। इसलिए केंद्र सरकार सूचना के अधिकार की तर्ज पर न्याय का अधिकार कानून लागू करने पर तेजी से कार्य कर रही है। इस व्यवस्था के लिए मसौदा तैयार करने का प्रथम चरण पूरा हो चुका है। ड्रॉफ्ट तैयार होने के पश्चात बिल को संसद में पेश किया जाएगा और पास होने के पश्चात कानून के रूप में लागू कर दिया जाएगा। इस पर ज्यादा कुछ अपनी टिप्पणी न देते हुए उन्होंने कहा कि जब यह कानून लागू होगा तो सभी आम नागरिकों के लिए केंद्र सरकार की वेबसाइट पर इसे सार्वजनिक कर दिया जाएगा|

अपराध से जुडे़ किसी भी स्थान पर चलेगा केस


सुप्रीम कोर्ट ने थाना-कचहरी का सीमा विवाद समाप्त करने वाला एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि अगर कोई अपराध एक स्थान से शुरू होकर लगातार दूसरे स्थान तक जारी रहता है तो उसका मुकदमा घटना से जुड़े किसी भी स्थान पर चलाया जा सकता है। यानि अगर पति या ससुराल वाले विवाहिता को प्रताडि़त करते हैं और उसी प्रताड़ना के क्रम में डरा-धमका कर मायके छोड़ जाते हैं तो मुकदमा ससुराल या मायके के किसी भी स्थान की अदालत में चल सकता है। पीडि़तों को राहत पहंुचाने वाला यह फैसला न्यायमूर्ति पी. सथाशिवम व न्यायमूर्ति बीएस चौहान की पीठ ने सुनाया है। कोर्ट ने दहेज प्रताड़ना की शिकार बिहार की रहने वाली सुनीता कश्यप की याचिका स्वीकार कर ली है और क्षेत्राधिकार के आधार पर उसके पति के खिलाफ दहेज का मुकदमा निरस्त करने का पटना हाईकोर्ट का फैसला खारिज कर दिया। कोर्ट ने गया की अदालत को सुनीता के पति संजय कुमार सैनी के खिलाफ लंबित आपराधिक मामले पर कानून के मुताबिक कार्यवाही करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि सुनीता की शिकायत देखने से पता चलता है कि उसके प्रति पति और ससुराल वालों की क्रूरता रांची में शुरू होती है और उसी क्रम में उसका पति दहेज की मांग पूरी न होने पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी देकर उसे मायके गया छोड़ जाता है। इस मामले में अपराध एक से अधिक थाना क्षेत्र में घटित हुआ है। अपराध घटित होने वाले स्थानों में गया भी है इसलिए गया की अदालत में मुकदमा चल सकता है। सुनीता की याचिका के मुताबिक उसकी शादी वर्ष 2000 में रांची निवासी संजय कुमार सैनी के साथ हुई। शादी के बाद से ही उसे दहेज के लिए प्रताडि़त किया जाने लगा। पहले उसके पति ने मकान ठीक कराने के लिए पिता से 4 लाख रुपये लाने का दबाव डाला और उसे मायके छोड़ गया और बाद कहा कि जब तक उसके पिता गया का मकान उसके नाम नहीं करते वह सुनीता को रांची वापस नहीं ले जाएगा। अंत में प्रताड़ना से ऊब कर सुनीता ने 2007 में पति और ससुराल वालों के खिलाफ गया के मगध मेडिकल कॉलेज थाने में शिकायत दर्ज कराई और गया की अदालत ने पति और ससुराल वालों के खिलाफ दहेज प्रताड़ना के मामले में संज्ञान लिया और ट्रायल शुरू किया। सुनीता के पति ने गया अदालत की कार्यवाही को क्षेत्राधिकार के आधार पर चुनौती दी। उसका कहना था कि मुकदमा तो रांची में चल सकता है क्योंकि घटना वहां की है। पटना हाईकोर्ट ने उसकी दलील स्वीकार करते हुए गया की अदालत में चल रहा मुकदमा खारिज कर दिया था|

Thursday, April 14, 2011

प्लास्टिक पैकिंग पर कोर्ट का रोक हटाने से इंकार


गुटखा व पान मसाला की प्लास्टिक पैकिंग पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक जारी रखी है और गुटखे से सेहत तथा प्लास्टिक से पर्यावरण को नुकसान का मुद्दा उठाने वाले संगठनों और स्वयं सेवी संस्थाओं को भी पक्षकार बना लिया है। हालांकि कोर्ट ने पान मसाला गुटखा उद्योग को भी पक्षकार के तौर पर शामिल करते हुए अपनी बात रखने की इजाजत दी है। बुधवार को न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी व न्यायमूर्ति केएस राधाकृष्णन की पीठ ने रोक हटाने से इंकार करते हुए सभी अर्जीकारों की पक्षकार बनने की मांग स्वीकार कर ली। पीठ ने कहा कि वे सभी का पक्ष सुनेंगे। कोर्ट ने पर्यावरण की सुरक्षा की दृष्टि से गुटखा के अलावा बाकी उत्पादों की प्लास्टिक पैकिंग पर भी रोक लगाने की गैर सरकारी संगठन दिल्ली स्टडी ग्रुप की मांग पर सरकार से जवाब मांगा है। कोर्ट ने केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलीसिटर जनरल गोपाल सुब्रह्मण्यम से चार सप्ताह में अर्जीकारों की मांगों का जवाब देने को कहा। इसके चार सप्ताह बाद अन्य पक्षकार अपना उत्तर देंगे। पीठ ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह गत 17 फरवरी की तंबाकू के इस्तेमाल पर आई रिपोर्ट की प्रतियां दो सप्ताह के भीतर अन्य पक्षकारों को उपलब्ध कराए। इससे पहले कई पान मसाला गुटखा निर्माता कंपनियों ने अर्जी दाखिल कर मामले में पक्षकार बनाए जाने का अनुरोध किया। दूसरी ओर इंडियन डेंटल एसोसिएशन के वकील विष्णु बिहारी तिवारी ने भी स्वास्थ्य का मुददा उठाते हुए मामले में पक्षकार बनाए जाने की मांग की। उन्होंने कहा कि एसोसिएशन लगातार गुटखे के नुकसान के प्रति लोगों को सचेत करती है और इसके खिलाफ मुहिम चलाती है। एसोसिएशन चाहती है कि तंबाकू युक्त गुटखे व पान मसाले की बिक्री पर पूरी तरह रोक लगाई जाए। उन्होंने इसके पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करने और केंद्र सरकार को ज्ञापन दिए जाने का भी हवाला दिया और कहा कि केंद्र सरकार ने उनके ज्ञापन के जवाब में कहा है कि मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। इसलिए वह कोई आदेश जारी नहीं कर सकती। पीठ ने तिवारी की दलीलें सुनने के पक्षकार बनने की उनकी मांग स्वीकार कर ली। पीठ ने 20 जुलाई को सुनवाई की तिथि तय करते हुए कहा कि तब कोई स्थगन नहीं होगा। गत 2 फरवरी को भी कोर्ट ने गुटखे की प्लास्टिक पैकिंग पर प्रतिबंध की तिथि बढ़ाने से इंकार कर दिया था और केंद्र सरकार से निर्धारित तिथि तक इस बावत अधिसूचना जारी करने को कहा था। केंद्र सरकार ने 4 फरवरी को अधिसूचना जारी कर गुटखा व पान मसाले की प्लास्टिक पैकिंग पर रोक लगा दी थी। मालूम हो कि कुछ पक्षकारों ने प्रतिबंध की अधिसूचना को भी भेदभाव वाला बताते हुए चुनौती दी है और कुछ ने प्रतिबंध के बावजूद गुटखे की प्लास्टिक पैकिंग में बिक्री जारी रहने का आरोप लगाते हुए अवमानना अर्जी दाखिल कर रखी है|

Tuesday, April 12, 2011

पैतृक फ्लैट में बहन का भी होगा हिस्सा


तीस हजारी कोर्ट ने पश्चिमी दिल्ली निवासी को आदेश दिया है कि वह अपने डीडीए के उस फ्लैट में से आधा हिस्सा बहन को दे, जो लगभग 25 साल पहले उसे उसकी मां की मौत के बाद पैतृक संपत्ति के तौर पर मिला था। यह आदेश देते हुए सिविल जज रवींद्रा कुमार पांडे ने कहा कि फिलहाल इस फ्लैट को न बेचा जाए और न ही किसी के नाम हस्तांतरित किया जाए। वह दो माह के अंदर इस फ्लैट का आधा हिस्सा अपनी बहन को दे दे। सुनैना (बदला हुआ नाम) ने एक अर्जी दायर करते हुए कहा था कि उसकी मां की मौत 1986 में हो गई थी। मां की संपत्ति के वह और उसका भाई हकदार हैं। इसलिए उसे भी फ्लैट में आधा हिस्सा मिलना चाहिए। हालांकि अदालत को इस मामले में एक तरफा आदेश देना पड़ा है क्योंकि सुनैना के भाई को बार-बार सम्मन जारी करने के बाद भी वह अदालत के समक्ष पेश नहीं हुआ। अदालत ने कहा कि सुनैना द्वारा पेश सबूतों के आधार पर यह पाया जाता है कि वह आधे फ्लैट की हकदार है। सुनैना का कहना है कि उसने भाई को बंटवारा करने के लिए कहा था परंतु उसने ऐसा नहीं किया। इतना ही नहीं उसका भाई इस फ्लैट को उसकी अनुमति के बिना की बेचना चाहता है|

Friday, April 8, 2011

कॉलेजियम की संवैधानिक वैधता दांव पर


Judges, reformers


माई लॉर्ड नहीं अब सिर्फ सर चलेगा


 पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में वकील भविष्य में न्यायाधीशों को माई लॉर्ड या माई लार्डशिप की बजाए सर कहकर संबोधित करेंगे। इस संबंध में गुरुवार को हाईकोर्ट बार एसोसिएशन द्वारा बुलाई गई आमसभा में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर दिया गया। बार एसोसिएशन द्वारा जारी की गई विज्ञप्ति में कहा गया है कि बार एसोसिएशन ने ब्रिटिश राज्य और कॉलोनियल विरासत की गुलामी के प्रतीक माई लॉर्ड या योर लॉर्ड जैसे संबोधनों की बजाए न्यायाधीशों को सर कह कर संबोधित किए जाने के प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पास कर दिया है। बार एसोसिएशन ने कहा है कि सभी वकील इस फैसले को मानने के लिए बाध्य होंगे। यदि कोई सदस्य इस फैसले का पालन नहीं करेगा तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। इसके साथ ही पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने विख्यात सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे द्वारा चलाई गई भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम को समर्थन देने का ऐलान किया। एसोसिएशन ने कहा कि सरकार को हजारे के सभी प्रस्तावों को स्वीकार कर लेना चाहिए। विज्ञप्ति में कहा गया है कि बार एसोसिएशन ने न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ भी बार-बार आवाज उठाई है। अब अन्ना हजारे द्वारा आरंभ की गई भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम में एसोसिएशन पूरी तरह से उनके साथ है। इसके बाद शाम को बार एसोसिएशन के सदस्यों ने सेक्टर 17 स्थित प्लाजा पर अन्ना हजारे के समर्थन में प्रदर्शन भी किया|

Wednesday, April 6, 2011

जजों की नियुक्ति के मामले की समीक्षा होगी


जजों की नियुक्ति में न्यायापालिका के एकाधिकार पर सरकार द्वारा सवाल खड़ा करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कॉलेजियम प्रणाली की संवैधानिक वैधता का परीक्षण करने का फैसला किया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाला कॉलेजियम (निर्णायक मंडल) ही शीर्ष न्यायालय और हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति करता है। सरकार के एतराज के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कॉलेजियम प्रणाली की वैधता पर बृहद पीठ द्वारा विचार के लिए दस सवाल तैयार किए। केंद्र सरकार ने जजों की नियुक्ति में न्यायपालिका के एकाधिकार पर सोमवार को सवाल उठाया था। सरकार ने मांग की थी कि वह 1993 में शीर्ष अदालत द्वारा दिए गए उस फैसले की समीक्षा करे, जिसके तहत जजों की नियुक्ति के मामले में न्यायपालिका को कार्यपालिका पर तरजीह दी गई थी। इस पर न्यायमूर्ति दीपक वर्मा और न्यायमूर्ति बीएस चौहान की विशेष पीठ ने पूरे मामले को मुख्य न्यायाधीश को सौंप दिया था ताकि वह इस पर बृहत पीठ में विचार कराएं। दोनों जजों की पीठ ने इस बारे में मंगलवार को विस्तार से आदेश पारित किया। जिसके तहत अदालत ने बृहत पीठ के विचार के लिए दस सवाल तैयार किए ताकि कॉलेजियम प्रणाली की वैधानिक की जांच हो सके। विशेष पीठ ने बृहत पीठ से इस तथ्य पर नए सिरे से विचार करने की अपेक्षा की है कि क्या अकेले न्यायपालिका को जजों की नियुक्ति करने का अधिकार है|
ये हैं विशेष पीठ के सवाल 1-क्या 1993 में शीर्ष न्यायालय की 7 सदस्यीय पीठ और 1998 में नौ सदस्यीय पीठ द्वारा दिया गया फैसला संविधान के अनुच्छेद 124(2) के अनुरूप है। यह अनुच्छेद सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति से संबंधित है? 2-क्या कॉलेजियम प्रणाली के जरिए जजों की नियुक्ति का संविधान में कोई प्रावधान है? 3-क्या न्यायिक फैसले से संविधान में संशोधन किया जा सकता है? 4-क्या संविधान में ऐसी कोई व्यवस्था है कि न्यायपालिका और कार्यपालिका के आपसी विचार-विमर्श और रजामंदी के बाद ही जजों की नियुक्ति की जा सकती है अथवा अकेले न्यायपालिका ही जजों की नियुक्ति कर सकती है? 5-क्या सलाह का आशय सहमति से है? 6-क्या न्यायिक व्याख्या के जरिए संविधान में लिखे गए शब्दों को व्यर्थ बनाया जा सकता है जैसा कि उपरोक्त फैसलों में किया गया लगता है। जिसने शीर्ष अदालत के न्यायाधीश की नियुक्ति में उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों से मंत्रणा को व्यर्थ बना दिया। जबकि संविधान के अनुच्छेद 124 (2) में स्पष्ट शब्दों इसकी अनुमति है? 7-क्या अनुच्छच्ेद 124(2) की स्पष्ट भाषा को न्यायिक फैसले के जरिए बदला जा सकता है? 8-क्या ऐसी कोई परंपरा है कि राष्ट्रपति मुख्य न्यायाधीश की सलाह मानने के लिए बाध्य हैं और क्या यह परंपरा 124(2) की स्पष्ट मंशा पर प्रभावी हो सकती है? 9-क्या जजों की नियुक्ति में मुख्य न्यायाधीश की राय को प्रधानता हासिल है और क्या ऐसी नियुक्तियों को बृहत पीठ रद कर सकती है? क्या है कॉलेजियम प्रणाली मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में जजों का वह पैनल ही कॉलेजियम (निर्णायक मंडल) कहलाता है जो सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति करता है। भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जे एस वर्मा की अगुवाई वाली पीठ ने ही 1993 में फैसला सुनाते हुए जजों की नियुक्ति के मामले में कार्यपालिका पर न्यायपालिका को तरजीह दी थी। उसके बाद से ही जजों की नियुक्ति कॉलेजियम प्रणाली से होने लगी|