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Wednesday, May 11, 2011

फिर अयोध्या मुद्दा


सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस निर्णय पर रोक लगा दी जिसमें अयोध्या में विवादित भूमि को तीन समान भागों में बांटने का निर्देश दिया गया था। तीन सदस्यीय न्यायपीठ के बहुमत से हाईकोर्ट का निर्णय पिछले साल 30 सितम्बर को आया था। यह 2.77 एकड़ के उस स्थान के बारे में था जिस पर कभी बाबरी मस्जिद का विवादास्पद ढांचा था। हाईकोर्ट का आदेश विधिसम्मत था या नहीं, यह देखना सुप्रीम कोर्ट का काम है। उसने इसी प्रकाश में सोमवार को पूर्व के निर्णय पर स्थगनादेश दिया है। हालांकि इससे एक बार फिर यह मुद्दा जीवंत होता दिख रहा है। इस बात पर बहस शुरू हो गई है कि तथ्यों-तकरे की रोशनी में निर्णय के वक्त क्या न्यायिक पीठ या न्यायाधीश अपने विवेकाधिकार का प्रयोग नहीं कर सकता; और करता है तो उसकी सीमा क्या है? वजह स्थगनादेश के साथ सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी है कि ‘ऐसे आदेश पर अमल की इजाजत नहीं दी जा सकती जिसके लिए किसी पक्ष ने आग्रह ही न किया हो।’ तो क्या इससे विवाद सुलट जाएगा? निश्चित ही सुप्रीम कोर्ट के फैसले से इस चिरकालिक विवाद के फिर व्यापक दायरे में जाने के आसार हैं। सही है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर करने वाले किसी पक्ष ने विवादित भूमि का बंटवारा करने का आग्रह नहीं किया था और न्यायालयों का कार्य भावनाओं में बहना नहीं होता बल्कि उन्हें तमाम सुबूतों के साथ जिरह-बहस में उठाये गए मुद्दों के मद्देनजर निर्णय देना होता है। किंतु क्या इससे इनकार किया जा सकता है कि फैसलों की कसौटी इंसाफ होना ही नहीं, इंसाफ दिखना भी है। इलाहाबाद हाईकोर्ट का निर्णय शायद इस अपेक्षा को पूरा करता था; तभी मामले के पक्षकारों और कतिपय राजनीतिजीवियों को छोड़कर पूरे देश ने ‘लोकसम्मत’ मानते हुए उसका स्वागत किया था। देश के बहुतायत लोगों को लगने लगा था कि हो न हो, इससे विवाद के खात्मे का कोई रास्ता निकले। अयोध्या विवाद बाबरी मस्जिद के विवादास्पद ढांचे की भूमि के मालिकाना हक को लेकर है। केंद्र सरकार ने उस जगह की ऐतिहासिकता की प्रामाणिकता के लिए पुरातात्विक जांच कराने से लेकर सारे उपाय किए पर राजनीति की कसौटी पर वे खरे नहीं उतर सके। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट को शायद प्रतीत हुआ है कि हाईकोर्ट का निर्णय पक्षकारों के आग्रह व तथ्यों-तकरे के बनिस्वत भावनाओं पर आधारित था तो इसे सुधारा ही जाना चाहिए। मगर देश में जो हालात हैं और राजनीति के क्षेत्र से उन्हें जिस प्रकार की उर्वरा मिल रही है, उसमें यह नहीं लगता कि राजनीतिक दलों की विवाद के समाधान में कोई रुचि है। लेकिन इस देश के साथ हमारी न्यायपालिका को अवश्य इस बात की गरज है कि किस प्रकार से हमेशा के लिए यहां शांति व सद्भाव का माहौल कायम हो जिससे देश के लोगों की सकारात्मक ऊर्जा पारस्परिक सौहार्द, भाईचारे और अंतत: हम सब की निरंतर प्रगति में लगे। यही कारण है कि सवाल उठ रहे हैं कि अब क्या होगा? ऐसा कौन सा निर्णय, कब आएगा जो सभी को मान्य हो? क्या न्यायपालिका के हस्तक्षेप के बिना यह सम्भव होगा?

Friday, April 22, 2011

खापों की खैरियत नहीं


देश की सबसे बड़ी अदालत ने खाप पंचायतों की दादागीरी पर लगाम लगाने का ऐतिहासिक फैसला लेकर तमाम मासूमों की जान बचा ली है। सुप्रीम कोर्ट ने ऑनर किलिंग को बर्बर बताते हुए, इनको सख्ती से बन्द करने का आदेश दिया है। जस्टिस माकर्डेय काटजू और ज्ञानसुधा मिश्रा की खंडपीठ ने इनको अवैध बताया और कहा कि इस ज्यादती को रोकने में विफल रहने वाले प्रशासनिक व पुलिस अधिकारियों को निलंबित किया जाए। 1500 वर्षो से पारंपरिक रूप से चली आ रही ये पंचायतें जाति व धर्म की आड़ में युवा प्रेमी जोड़ों को जान से मारने या ऐसी धमकी देने के लिए अकसर र्चचा में आती रही हैं। सरकारें अब तक इनके इन वीभत्स कारनामों पर मौन साधे रही हैं, क्योंकि उनको अपना वोट बैंक ज्यादा प्यारा है। बेंच के इस फैसले का असर सीधे युवाओं पर नजर आयेगा, साथ ही वो अपराध भी रुकेंगे, जिन पर पंचायतें हास्यास्पद फैसले सुना दिया करती हैं। ताजा खबर है कि 5 साल की बच्ची का रेप करने वाले युवक को ऐसी ही पंचायत ने बस 5 चप्पलें मार कर छोड़ दिया। बच्ची की तो जान भी चली गई पर उसके मां-बाप को पुलिस में शिकायत नहीं दर्ज कराने दी गयी। दो दिन पहले राजधानी से सटे भिवानी में एक बलात्कारी ने अपने परिवार की दो विधवाओं को चरित्रहीन बता कर सरेआम मार डाला। कानून को अपने हाथ में लेने की उतावली और इज्जत की आड़ में कमजोर वर्ग/जाति का शोषण किसी से छिपा नहीं है। यह सच है कि व्यवस्थागत ढिलाई के कारण कानून-व्यवस्था उन दूर-दराज के इलाकों तक नहीं पहुंचती, जहां आज भी सामंती सोच हावी है। आम आदमी बहुत निर्धन है, वह अंगूठाटेक है, उसको खाने के लाले हैं और गांव-घर से जबरन निकाले जाने का भय उसको इन पंचायतों के आगे घुटने टेकने को मजबूर करता रहा है। ऑनर किलिंग की आड़ में इन पंचायतों के सामंती फरमान वैसे ही रुकेंगे, जैसे सती प्रथा को रोका जा सका है। एक तरफ हम बार-बार आजादी और निजता के कसीदे काढ़ते हैं, दूसरी तरफ प्रेम करने वाले नवयुवाओं को सरेआम फांसी पर लटकाये जाने के वीभत्स पंचायती फैसले दिल दहला जाते हैं। ग्रामीण परिवेश में पंचायतों की भूमिका कभी सकारात्मक भी रही है, जिन्हें प्रेमचंद के शब्दों में पंच परमेश्वर माना जाता था, जिनका आस-पास के गांवों में सम्मान हुआ करता था। लेकिन उनके अमानवीय फरमानों ने दिल-दहलाऊ हरकतों द्वारा उन लोगों का जीना मुश्किल कर दिया, जिनके लिए 'अभी दिल्ली दूर है।' अदालत के इस फैसले से सिर्फ प्रेमीजन ही चैन की सास नहीं ले रहे होंगे बल्कि प्रशासन और पुलिस को भी अपनी मुस्तैदी चुस्त करने की कवायद शुरू कर देनी पड़ी होगी। जिसको गुनाह के बाद झकझोर कर उठाया जाता रहा है, वे अपने सूचना तंत्र को कैसे पुख्ता करते हैं, यह तो उनको स्वंय ही सोचना होगा।

Friday, April 1, 2011

जातिसूचक शब्द के प्रयोग पर कार्रवाई नहीं


जाति सूचक शब्द के जरिए अपमानित करने वाली भाषा का प्रयोग जनता के सामने हो तभी एफआईआर दर्ज की जा सकती है कानून में साफतौर पर कहा गया है कि अगर गैर-एससी,एसटी जाति का व्यक्ति जानबूझकर दलित को अपमानित करने के मकसद से जनता के बीच जातिसूचक भाषा का इस्तेमाल करता है तभी उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज करके कानूनी प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सकता है
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अनुसूचित जाति और जनजाति कानून के तहत अभियुक्त के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए जरूरी है कि जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल दलित व्यक्ति की उपस्थिति में उसके सामने किया गया हो। अगर उसकी गैर- हाजिरी में कोई जातिसूचक शब्दों से उसका अपमान करने की कोशिश करता है तो ऐसी सूरत में एससी, एसटी एक्ट के तहत कार्रवाई नहीं हो सकती। जाति सूचक शब्द के जरिए अपमानित करने वाली भाषा का प्रयोग जनता के सामने हो तभी एफआईआर दर्ज की जा सकती है। किसी के निवास स्थान पर इस तरह की घटना भी कानूनी कार्रवाई के काबिल नहीं है। जस्टिस दलवीर भंडारी और दीपक वर्मा की बेंच ने हैदराबाद के एक स्कूल की प्रिंसपल की याचिका पर यह फैसला सुनाया। हैदराबाद पुलिस ने प्रधानाध्यापिका असमथुनिसा और उसके पति मोहम्मद समीउद्दीन के खिलाफ अनुसूचित जाति- जनजाति निवारण अधिनियम की धारा तीन के तहत 2006 में एफआईआर दर्ज की थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि कानून में साफतौर पर कहा गया है कि अगर गैर-एससी, एसटी जाति का व्यक्ति जानबूझकर दलित को अपमानित करने के मकसद से जनता के बीच जातिसूचक भाषा का इस्तेमाल करता है तभी उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज करके कानूनी प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि असथुनिसा के पति समीउद्दीन ने अपने पड़ोसी को जातिसूचक शब्दों से अपमानित करने की कोशिश की। घटना उसके घर में हुई। उस समय वह घर में नहीं था। उसकी पत्नी श्रीदेवी के सामने समीउद्दीन ने जाति का इस्तेमाल किया। बेंच का मत था कि पुलिस में लिखाई रिपोर्ट को अगर सच भी मान लिया जाए तो भी असथुनिसा के खिलाफ एससी, एसटी एक्ट के तहत मुकदमा नहीं चल सकता। जात-पात की बात उसके पति ने की थी न कि असथुनिसा ने। कथित वारदात के समय पति के साथ खड़े रहने से पत्नी के खिलाफ केस नहीं बनता। पुलिस ने इस बात की तफ्तीश भी नहीं की कि जातिबरादरी का नाम लेकर टिप्पणी करने वाला किस जाति का है। कानून के अनुसार एससी, एसटी जाति के व्यक्ति के खिलाफ इस कानून के तहत मुकदमा दर्ज नहीं हो सकता, भले ही उसने जातिसूचक शब्दों से किसी को अपमानित किया हो। बेंच ने कहा कि आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट को एफआईआर रद्द करने का आदेश दे देना चाहिए था। एससी,एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज करने के मौलिक तत्व मौजूद न होने पर कथित अभियुक्तों के खिलाफ पहली नजर में किसी तरह का सबूत नहीं है।


Monday, March 7, 2011

न्यायपालिका ने दिखाया सही रास्ता


इस फैसले से कई और सवाल उठते हैं। थॉमस अगर चार्जशीटेड थे तो उन्हें इतने बड़े संवैधानिक पद के लिए चुना क्यों गया? प्रधानमंत्री ने गलती मानी है, यह तो ठीक है। लेकिन गलती मानने के लिए सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक का इंतजार करना सही नहीं है।
हाल के दिनों में सुप्रीम कोर्ट की सजगता की वजह से कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच परफेक्ट बैलेंस बनता दिख रहा है। अब हर छोटे-बड़े काम की मीमांसा होगी, हर गलत फैसले को सुधारना होगा, हर पावरफुल अधिकारी को यह मानना होगा कि वह अपनी मनमानी नहीं कर पाएगा। स्वस्थ प्रजातंत्र को इससे ज्यादा और क्या चाहिए
सबसे पहले तो मैं सुप्रीम कोर्ट को सलाम करना चाहता हूं। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले कुछ दिनों में यह दिखा दिया है कि शासन तंत्र का एक अंग अगर ठीक से काम नहीं कर रहा हो तो उसे कैसे दुरुस्त किया जाए। 2जी स्पेक्ट्रम के आवंटन में भारी घपला हुआ था। पिछले चार साल से सबको यह पता है। बेशकीमती सरकारी संपदा यानी स्पेक्ट्रम कम्पनियों को कौड़ी के भाव दे दिये गए। किसे फायदा पहुंचाया जाए, इसमें भी सारी हदें पार कर दी गई। जांच से यह बात खुल कर सामने आ रही है कि नये-नये तरीकों से पैसे का लेन-देन हुआ। मामला पूरी तरह से दबा दिया जाता अगर सुप्रीम कोर्ट की तरफ से पहल नहीं हुई होती। इस पूरे मामले में सीएजी की रिपोर्ट आई जिसमें यह कहा गया कि स्पेक्ट्रम के आवंटन में गलत फैसले की वजह से सरकार को करीब एक लाख 76 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। पहले यह कोशिश हुई कि इस रिपोर्ट को ही झूठा साबित कर दिया जाए। बात नहीं बनी तो यह कह दिया गया कि कंज्यूमर को फायदा पहुंचाने के लिए स्पेक्ट्रम को सस्ते भाव पर कम्पनियों को दिया गया। लेकिन इस तरह की थोथी दलील से बात नहीं बनी। सुप्रीम कोर्ट की पहल पर पूर्व टेलीकॉम मंत्री ए. राजा, उनके निजी सचिव और उस समय के टेलीकॉम सचिव को गिरफ्तार किया गया। तीनों अभी जेल में ही बंद हैं। इसके अलावा कई कॉरपोरेट दिग्गजों से लम्बी पूछताछ हुई। कुछ को गिरफ्तार भी किया गया। यह सब सुप्रीम कोर्ट की सजगता का ही परिणाम है। इसी बीच, यह भी खबर आई कि भ्रष्टाचार से लड़ाई लड़ने वाली सर्वोच्च संस्था के मुखिया के चुनाव में ही घपला हुआ है। मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा। कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में सीवीसी की नियुक्ति को अवैध माना। दरअसल, हुआ यह कि जिन पीजे थॉमस साहब को सीवीसी नियुक्त किया गया, उनके खिलाफ पिछले 19 साल से एक मामला चल रहा है। मामला यह है कि जिस समय वह केरल के फूड और सिविल सप्लाई सचिव थे, उस समय मलयेशिया से पामोलिन का आयात हुआ था। थॉमस के खिलाफ आरोप है कि उनके फैसले की वजह से केरल सरकार को दो करोड़ तीस लाख रुपये का नुकसान हुआ। सवाल यह नहीं है कि थॉमस के खिलाफ लगे आरोप सही हैं या नहीं। सवाल यह है कि जिस पर खुद भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं, वह भ्रष्टाचार से लड़ने वाली संस्था का मुखिया कैसे हो सकता है? थॉमस को जानने वाले उनकी सचाई की दुहाई देते हैं। लेकिन सवाल यह है कि इतने लम्बे समय तक इतने ऊंचे ओहदे पर रहने वाला अफसर 19 साल तक अपने आप को बेदाग क्यों नहीं साबित कर पाया? क्या ऐसा तो नहीं है कि सत्ता के घमंड में सबको दबाने की कोशिश की गई? दरअसल, सत्ता के नशे में चूर हर व्यक्ति यह भूल जाता है कि नेचुरल जस्टिस जैसी भी कोई चीज होती है। सत्ता पर आसानी बड़े लोग अक्सर यह भूल जाते हैं कि जिस सिस्टम की वजह से वह पावरफुल बने हुए हैं वह सिस्टम सबसे ऊपर है। ‘लॉ ऑफ लैंड’ की कद्र नहीं हुई तो सारे पावर अपने आप फुर्र हो जाते हैं। यह हुआ भी। सुप्रीम कोर्ट ने सीवीसी के मामले पर कह दिया कि पीजे थॉमस जैसे लोगों को सीवीसी के पद पर रहना उस संस्था के मूल्यों से समझौता है। थॉमस भले ही पाक-साफ रहे हों। हो सकता है कि उन्होंने कोई गलती नहीं की हो। लेकिन सीवीसी के पद पर बने रहने के लिए उन्होंने जिस तरह की थोथी दलीलें दीं, वह पूरे शासन तंत्र को शर्मसार करता है। अपनी गलती छुपाने के लिए उन्होंने यह तक कह डाला कि मामले तो 150 से ज्यादा सांसदों के खिलाफ भी हैं। उनको पद से हटाने की बात क्यों नहीं होती है? थॉमस साहब शायद यह भूल गए कि सांसदों का फैसला हर पांच साल पर जनता की अदालत में हो जाता है जबकि वह पिछले 19 साल से ढ़ाई करोड़ रुपये के मामले को निगलकर नई-नई कुर्सियां पाते रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद थॉमस का भविष्य तय हो गया है। लेकिन इस फैसले से कई और सवाल उठते हैं। थॉमस अगर चार्जशीटेड थे तो उन्हें इतने बड़े संवैधानिक पद के लिए चुना क्यों गया? प्रधानमंत्री ने अपने सिर पर जिम्मेदारी लेकर अपना बड़प्पन दिखाया है। लेकिन इतने बड़े पद पर किसी को आसीन करने में जल्दबाजी ठीक नहीं होती है। प्रधानमंत्री ने गलती मानी है, यह तो ठीक है। लेकिन गलती मानने के लिए सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक का इंतजार करना सही नहीं है। अब तो बस यही उम्मीद है कि आने वाले दिन में ऐसी गलती फिर से दुहराई नहीं जाए। मैं आशावादी हूं और मुझे बहुत कुछ अच्छा होता दिख रहा है। सबसे अच्छी बात यह है कि हमारा प्रजातंत्र इतना मजबूत हो गया है कि इसमें गलती करने वाला कितना ही पावरफुल क्यों न हो, उसे भी अपनी गलती माननी पड़ती है। प्रजातंत्र में कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच परफेक्ट बैलेंस होना बेहद जरूरी होता है। अगर कार्यपालिका को लगे कि वह इतनी पावरफुल है कि कुछ भी कर सकती है और कोई अंकुश लगाने वाला भी नहीं है तो ये काफी खतरनाक होता है। ऐसे ही माहौल में करप्शन फलता-फूलता है। विधायिका कुछ कानून बना ले और कोई रिव्यू नहीं हो, वह भी वांछनीय नहीं है। लेकिन हाल के दिनों में सुप्रीम कोर्ट की सजगता की वजह से कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच परफेक्ट बैलेंस बनता दिख रहा है। अब हर छोटे-बड़े काम की मीमांसा होगी, हर गलत फैसले को सुधारना होगा, हर पावरफुल अधिकारी को यह मानना होगा कि वह अपनी मनमानी नहीं कर पाएगा। स्वस्थ प्रजातंत्र को इससे ज्यादा और क्या चाहिए। कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच फिर से परफेक्ट बैलेंस बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट को मैं एक बार फिर सलाम करता हूं। देश और प्रजातंत्र का भला इसी में है।


Thursday, February 24, 2011

त्वरित न्याय के ठंडे छींटे


गोधरा नरसंहार मामले में पूरे देश की निगाहें इस बात पर टिकी थीं कि कोर्ट इस जघन्य कांड को साजिश मानता है या दुर्घटना। उनसठ निदरेषों की मौत पर चली राजनीति और जांच के लिए बनाए गए दो आयोगों की विरोधाभासी रिपोटरे के बीच ऐसा अस्वाभाविक भी नहीं था। पर, इस फैसले में छुपे चंद सकारात्मक संदेश और भी हैं जिन पर भी देश को गौर करना चाहिए। सबसे पहले तो अदालत को इस बात के लिए बधाई मिलनी चाहिए कि उसने कम से कम समय में ऐसे संवेदनशील मामले को फैसले की मंजिल तक पहुंचा दिया। हालांकि, यह फैसला नरसंहार के नौ सालों के बाद आया लेकिन असलियत यह है कि अदालत ने तीन साल से कम अवधि में ही मामले की सुनवाई कर फैसला सुना दिया। बीच का लम्बा अंतराल सिर्फ इसलिए पैदा हुआ क्योंकि सुप्रीमकोर्ट ने वर्ष 2003 के नवम्बर से 2009 के मई माह तक ट्रायल पर रोक लगा रखी थी। रोक के पीछे ऐसे आरोप थे कि जांच को प्रभावित किया जा रहा है। सुप्रीमकोर्ट ने अपनी निगरानी में सीबीआई से जांच करवाई और आश्वस्त होने के बाद ही सुनवाई शुरू होने के आदेश दिए। मामला भी खासा पेचीदा था जिसमें अदालत को ढाई सौ से अधिक लोगों की गवाही लेनी पड़ी और डेढ़ हजार के आसपास सम्बंधित दस्तावेजों का अध्ययन करना पड़ा। बावजूद इसके, इतने कम समय में फैसला सुना कर अदालत ने साबित कर दिया कि भारतीय न्यायपालिका आदत से लेटलतीफ नहीं है। अगर देश की अदालतों में तीन करोड़ मामले लम्बित पड़े हैं तो इसकी जिम्मेदार न्यायपालिका नहीं बल्कि वह व्यवस्था है जो उसे मजबूरी की बेड़ियों में जकड़े रखती है। वैसे गोधरा से भी पहले उड़ीसा के कंधमाल दंगों में भी अदालत ने ऐसा ही रिकॉर्ड बनाया था जब महज दो सालों में फैसला सुना दिया गया था और दोषी दंड पा गए थे। बेशक गोधरा के त्वरित न्याय के पीछे सुप्रीमकोर्ट की भूमिका भी कम नहीं है जिसने विशेष जांच टीम से अपनी निगरानी में जांच करवाई। सवाल है कि अन्य मजहबी दंगों या बड़े मामलों में यह प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाई जा सकती? साम्प्रदायिक दंगे न केवल निदरेष परिवारों को तबाह करते हैं बल्कि लोकतंत्र पर बदनुमा धब्बा भी लगाते हैं। दंगों के पहले और बाद में भी राजनीति का वीभत्स खेल चलता है और आम आदमी का विश्वास टूटता है। सिख विरोधी दंगों को बीते चौथाई सदी से अधिक का समय हो चुका है लेकिन अदालत और कानून का खेल आज भी जारी है। करीब इतना ही समय मेरठ दंगों को बीते हो चुका है लेकिन न्याय इसमें भी घोंघे की रफ्तार से चल रहा है। भागलपुर के बदनाम दंगों का फैसला अट्ठारह साल बाद आया तो मुम्बई दंगों पर श्रीकृष्ण कमेटी की रिपोर्ट पर दो दशकों बाद भी कार्रवाई नहीं हो पाई है। गोधरा दंगे पर चली न्याय की ऐसी प्रक्रिया से सबक लेने और भविष्य के ऐसे मामलों में इसे दोहराने की जरूरत साफ दिखती है। अफसोस यह है कि लोकतंत्र का सशक्त स्तम्भ माने जाने के बावजूद न्यायपालिका को वह तवज्जो और संसाधनों का वह लाभ नहीं दिया जाता जिसकी वह स्वाभाविक हकदार है। न्याय में विलम्ब का मतलब न्याय नहीं मिलना, इस जुमले को दोहराते तो सब हैं लेकिन इसे सुधारने में रुचि कम ही दिखाते हैं। न्यायपालिका में व्यापक सुधारों के लिए प्रस्तावित कानून को कब संसद का मुंह देखना नसीब होगा,पता नहीं! साम्प्रदायिक दंगों और पीड़ितों के पुनर्वास के लिए प्रस्तावित विधेयक जल्द ही संसद में आने वाला है। उम्मीद है कि इसमें पिछले दिनों मिले सबकों का पूरा इस्तेमाल होगा और त्वरित न्याय का उपहार देश को मिलेगा।


Sunday, January 30, 2011

हज सब्सिडी संविधान का उल्लंघन नहीं


सार्वजनिक धन का कुछ हिस्सा तीर्थयात्रा में छूट के लिए दिया जाता है तो यह असंवैधानिक नहीं : सुप्रीम कोर्ट
इलाहाबाद के कुंभ मेला, चीन की मानसरोवर यात्रा पाक गुरुद्वारों में जाने के लिए भी दी जाती है विशेष छूट
नई दिल्ली (एजेंसियां) उच्चतम न्यायालय ने अपनी व्यवस्था में शुक्रवार को कहा कि हज यात्रा के लिए मुस्लिमों या अन्य धमोंर्ं को इसी प्रकार के लाभ देना संविधान का उल्लंघन नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि हज करने के लिए मुस्लिमों को सब्सिडी देना अनुच्छेद 14 (समानता), 15 बी (गैर भेदभाव) और 27 (किसी भी धर्म को प्रोत्साहित करने के लिए कोई सार्वजनिक कर नहीं देना) का उल्लंघन है। न्यायमूर्ति मार्कण्डेय काटजू और न्यायमूर्ति ज्ञान सुधा मिश्रा ने कहा कि यदि सार्वजनिक धन का कुछ हिस्सा तीर्थयात्रा में छूट के लिए इस्तेमाल किया जाता है तो इसमें कोई असंवैधानिक बात नहीं है। पीठ ने कहा, ‘हमारा मानना है कि अनुच्छेद 27 का उल्लंघन उस स्थिति में होगा यदि भारत में एकत्र की जानेवाली समस्त आय कर का पर्याप्त हिस्सा या संपूर्ण केंद्रीय आबकारी या सीमा शुल्क या विक्र कर का पर्याप्त हिस्सा या किसी भी अन्य प्रकार के कर के पर्याप्त हिस्से का किसी धर्म विशेष या धार्मिक संप्रदाय के प्रोत्साहन के लिए इस्तेमाल किया जाता है।पीठ ने कहा, ‘दूसरे शब्दों में मान लीजिए कि भारत में एकत्र किए गए 25 फीसद आय कर का इस्तेमाल किसी धर्म विशेष या धार्मिक संप्रदाय को प्रोत्साहित करने में किया जाता है तो हमारे विचार में यह संविधान के अनुच्छेद 27 का उल्लंघन होगा।उच्चतम न्यायालय ने यह टिप्पणी भाजपा के पूर्व सांसद प्रफुल्ल गोरदिया की याचिका को खारिज करते हुए की जिन्होंने हज कमेटी अधिनियम 1959 की संवैधानिक वैधता को इस आधार पर चुनौती दी थी कि यह संविधान विशेष तौर पर अनुच्छेद 27 का उल्लंघन है। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि वह हिंदू हैं, लेकिन उसके द्वारा दिए जानेवाले प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कर का कुछ हिस्सा हज यात्रा में चला जाता है जो सिर्फ मुस्लिमों द्वारा की जाती है। उन्होंने अनुच्छेद 27 का हवाला दिया जिसमें किसी धर्म विशेष के प्रोत्साहन के लिए कर के भुगतान का निषेध है। न्यायालय ने इस संबंध में केंद्र सरकार और उप्र सरकार के हलफनामों पर भी गौर किया जिसमें कहा गया था कि इलाहाबाद के कुंभ मेला, चीन की मानसरोवर यात्रा और पाकिस्तान के गुरुद्वारों में जाने के लिए तीर्थयात्रियों को विशेष छूट दी जाती है।