Showing posts with label पृष्ठ संख्या १. Show all posts
Showing posts with label पृष्ठ संख्या १. Show all posts

Friday, September 30, 2011

भुल्लर की दया याचिका पर आठ साल क्यों लगे


सुप्रीमकोर्ट ने फांसी की सजा पाए देवेन्द्र पाल सिंह भुल्लर की दया याचिका के निपटारे में 8 साल का समय लगने पर सरकार से जवाब मांगा है। इतना ही नहीं, अदालत ने फांसी की सजा पर हो रही राजनीति पर भी कड़ी टिप्पणियां की। भुल्लर 1993 के दिल्ली बम विस्फोट का दोषी है, जिसमें नौ लोगों की मौत हुई थी। भुल्लर को अदालत ने फांसी की सजा सुनाई थी। सुप्रीमकोर्ट तक से सजा पर मुहर लगने के बाद भुल्लर ने 2003 में राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका दाखिल की थी, जो 25 मई 2011 को खारिज हो गई। भुल्लर ने सुप्रीमकोर्ट में याचिका दाखिल कर देरी के आधार पर फांसी की सजा को उम्रकैद में बदलने का अनुरोध किया है। भुल्लर का 13 दिसंबर 2010 से मानव व्यवहार एवं संबद्ध विज्ञान संस्थान (इहबास) में इलाज चल रहा है। न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी की अध्यक्षता वाली पीठ ने बुधवार को भुल्लर की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एचपी रावल से कहा, सब जानना चाहते हैं कि 2003 से 2011 तक क्या हुआ। कोर्ट ने फांसी की सजा पर हो रही राजनीति पर तीखी टिप्पणियां करते हुए कहा,हम अपनी आंखें बंद कर लें, लेकिन दुर्भाग्य से अखबार पढ़ना नहीं बंद कर सकते। कुछ लोगों को समर्थन मिलता है, कुछ को नहीं। ये चीजें तब अहम हो जाती हैं जब दोषी को फांसी की सजा दी जाती है। कोर्ट ने कहा, वे सिर्फ संवैधानिक व कानूनी पहलू पर ही विचार कर सकते हैं। रावल ने कहा, देरी का कारण गृह मंत्रालय ही बता सकता है। भुल्लर की दया याचिका से संबंधित दस्तावेज गृह मंत्रालय को 27 मई 2003 को ही भेज दिये थे। मंत्रालय ने दिल्ली सरकार को 30 मई 2011 को पत्र भेज कर भुल्लर की दया याचिका खारिज होने की जानकारी दी। वे मंत्रालय से बात कर अदालत में हलफनामा दाखिल करेंगे। पीठ ने उनका बयान रिकार्ड करते हुए 10 अक्टूबर तक हलफनामा पेश करने को कहा। साथ ही मामले की सुनवाई के लिए 19 अक्टूबर की तिथि तय कर दी। इससे पहले भुल्लर के वकील केटीएस तुलसी से कहा,दिल्ली सरकार ने हलफनामा पेश किया है, पर देरी की वजह नहीं बताई है।


Thursday, July 28, 2011

खून भले खौले लेकिन आरक्षण कड़वा सच


सुप्रीम कोर्ट ने सामान्य श्रेणी के छात्रों को नसीहत देते हुए कहा कि शैक्षिक संस्थानों और नौकरियों में पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण कड़वा सच है। आरक्षण को लेकर सामान्य श्रेणी के छात्रों का खून भले ही खौलता हो, लेकिन उन्हें इसे समझना चाहिए। केंद्रीय विश्वविद्यालयों में ओबीसी छात्रों के लिए 27 फीसदी आरक्षण लागू करने में कट ऑफ मार्क का मतलब स्पष्ट करने की दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति आर वी रवींद्रन और न्यायमूर्ति ए के पटनायक की पीठ ने बुधवार को यह टिप्पणी की। इसके साथ ही पीठ ने मामले को प्रधान न्यायाधीश एसएच कपाडिया को कानून में कट-ऑफ शब्द के इस्तेमाल पर भ्रम को दूर करने के लिए उचित पीठ का गठन करने के लिए सौंप दिया। अदालत ने कहा,हम जानते हैं कि सामान्य श्रेणी के छात्र क्या महसूस करते हैं। हमें पता हैं कि जब कम अंक वाले (आरक्षित श्रेणी के) छात्रों को दाखिला लेते वे देखते होंगे तो उनका खून खौलता होगा, लेकिन उन्होंने जानना चाहिए कि आरक्षण कटु यथार्थ है। उन्हें इसे समझना चाहिए। हम गैर बराबर लोगों के साथ बराबर जैसा बर्ताव नहीं कर सकते। अदालत ने यह टिप्पणी उस वक्त की जब सुनवाई के दौरान आरक्षण विरोधी समूह के एक वकील ने दलील दी कि अगर आरक्षित श्रेणी में दाखिला लेने वाले छात्रों की गुणवत्ता पर अंकुश लगाए बिना आंख मूंदकर आरक्षण लागू होगा, तो शिक्षा का स्तर गिरेगा। इस टिप्पणी के अलावा पीठ में शामिल न्यायमूर्ति रवींद्रन ने अधिवक्ता पीपी राव की टिप्पणी से नाराज होकर खुद को सुनवाई से अलग कर लिया। राव ने कहा था कि पीठ में न्यायमूर्ति दलवीर भंडारी को भी शामिल होना चाहिए, क्योंकि मुद्दा उनके दिए गए फैसले की व्याख्या का है। इससे नाराज रवींद्रन ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का हर न्यायाधीश किसी भी फैसले की व्याख्या कर सकता है। यहां ऐसा कोई सिद्धांत नहीं है कि जिसका फैसला हो वही न्यायाधीश उसकी व्याख्या करेगा। फैसला सुप्रीम कोर्ट का होता है किसी न्यायाधीश का नहीं। उन्होंने आगे सुनवाई से इंकार करते हुए कहा कि वह सेवानिवृत होने वाले हैं और वह किसी विवाद में नहीं पड़ना चाहते। हालांकि, केंद्र सरकार की ओर से पेश वकील ने राव की दलील का विरोध किया था और पीठ से सुनवाई जारी रखने का आग्रह किया था। मद्रास आइआइटी के सेवानिवृत निदेशक पीवी इंद्रेशन ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल कर रखी है। अर्जी में सुप्रीम कोर्ट से कट ऑफ मार्क का मतलब स्पष्ट करने का अनुरोध किया गया है। कहा गया है कि जेएनयू में ओबीसी छात्रों को प्रवेश देने में दस फीसदी की छूट का मानक क्या होगा। यह मानक सामान्य वर्ग के अंतिम छात्र के कट ऑफ मार्क से दस फीसदी कम होगा या फिर सामान्य वर्ग के लिए निर्धारित पात्रता अंकों से दस फीसदी कम। केंद्रीय शिक्षण संस्थाओं में ओबीसी कोटे का आरक्षण सही ठहराने वाली पांच न्यायाधीशों की संविधानपीठ में शामिल न्यायमूर्ति दलवीर भंडारी ने अपने फैसले में कहा था कि सामान्य वर्ग के कट ऑफ मार्क से दस नंबर कम पर ओबीसी को प्रवेश दिया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में आजकल इसी दस फीसदी कट ऑफ के मानक पर बहस चल रही थी|

Saturday, July 9, 2011

सुप्रीम कोर्ट ने इंटरनेट पर डाले जजों पर कार्रवाई के आंकड़े


 भले ही न्यायपालिका में गोपनीयता पर गाहे बगाहे टिप्पणियां की जाती हों, लेकिन अब स्थिति वह नहीं रही। न्यायपालिका धीरे-धीरे पारदर्शिता की ओर कदम बढ़ा रही है। सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार अपनी वेबसाइट पर अधीनस्थ अदालतों के न्यायधीशों पर हुई प्रशासनिक व अनुशासनात्मक कार्रवाई के आंकड़े डाले हैं। जिनके मुताबिक पिछले साल जनवरी से इस वर्ष 31 मार्च तक 75 जजों को विभागीय जांच के बाद सेवानिवृत्ति दे दी गई, जबकि 305 के खिलाफ अभी जांच लंबित है। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को अपनी वेबसाइट पर देशभर की अधीनस्थ अदालतों के न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ की गई अनुशासनात्मक विभागीय कार्रवाई का आंकड़ा डाला है। आंकड़ों के मुताबिक पिछले साल विभागीय जांच के बाद जिला जज कैडर के 55, सिविल जज सीनियर डिवीजन कैडर के 16 और सिविल जज जूनियर डिवीजन कैडर के 4 जजों को 50, 55 और 58 वर्ष में कार्य समीक्षा के बाद स्थायी तौर पर सेवानिवृत्त कर दिया गया। 38 जजों पर मेजर पेनाल्टी (बड़ा दंड) लगाई गई, जबकि 35 पर माइनर पेनाल्टी लगी। 305 जजों के खिलाफ अभी जांच लंबित है जिनमें सबसे अधिक संख्या उत्तर प्रदेश की है जहां 44 जजों के खिलाफ जांच लंबित है। वेबसाइट पर डाले गए कार्रवाई के पूरे चार्ट में 8 खंड है जिनमें आखिरी खंड रिमार्क का है जो कि शुरू से अंत तक खाली है|

Thursday, July 7, 2011

गुजरात का माहौल अब पहले से बेहतर : सुप्रीम कोर्ट

 नरेंद्र मोदी सरकार को बड़ी राहत देते हुए उच्चतम न्यायालय ने 2008 में देश भर में हुए श्रृंखलाबद्ध विस्फोटों के 64 आरोपियों के खिलाफ सुनवाई गुजरात से बाहर करने के अनुरोध को बुधवार को खारिज कर दिया। अदालत ने इस दावे को भी नहीं माना कि गुजरात में सुनवाई होने से सांप्रदायिक भावनाएं भड़क सकती हैं। न्यायालय के अनुसार गुजरात का माहौल अब पहले की तरह नहीं है। यह आशंका बेकार है कि वहां निष्पक्ष सुनवाई नहीं हो सकती। इसलिए अहमदाबाद धमाकों के मामले की सुनवाई गुजरात में ही होगी। न्यायमूर्ति अल्तमश कबीर और न्यायमूर्ति साइरस जोसेफ की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि आरोपी जाहिद शेख और अन्य की गिरफ्तारी को छोड़ कर इस बात के सबूत बहुत ही कम हैं कि गुजरात का माहौल देखते हुए सुनवाई राज्य से बाहर की जानी चाहिए। वर्ष 2008 में दिल्ली, मुंबई, जयपुर, अहमदाबाद और बेंगलूर जैसे बड़े शहरों में श्रृंखलाबद्ध विस्फोटों में 56 लोग मारे गए थे और कई घायल हुए थे। आरोपियों के खिलाफ सुनवाई गुजरात में हो रही है, लेकिन उन्होंने इस आधार पर सुनवाई राज्य से बाहर कराने की मांग की थी कि पुलिस, अभियोजन पक्ष और पीठासीन न्यायाधीश हिंदुओं के पक्ष में हैं और इस वजह से उनके साथ भेदभाव हो सकता है। अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने आरोपियों की ओर से तर्क दिया था कि यदि सुनवाई गुजरात में हुई तो सांप्रदायिक हिंसा फिर भड़क सकती है। अदालत ने आरोपियों की इस याचिका को खारिज कर दिया कि 2002 के दंगों के बाद सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील इस भाजपा शासित राज्य में स्वतंत्र और निष्पक्ष सुनवाई नहीं हो सकती। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि गुजरात दंगों के बाद स्थितियों में सुधार आया है और आरोपियों का यह दावा केवल आशंका ही है कि स्वतंत्र तरीके से सुनवाई नहीं हो सकती। बहरहाल, न्यायालय ने आरोपियों को छूट दी कि अगर उन्हें प्रतिकूल माहौल में सुनवाई की आशंका हो तो वे फिर अदालत आ सकते हैं। इससे पहले उच्चतम न्यायालय ने 2009 में आरोपियों की याचिका पर मामले की सुनवाई स्थगित कर दी थी|

Wednesday, July 6, 2011

दिनकरन पर चलेगा महाभियोग


 पद के दुरुपयोग के मामले में महाभियोग की कार्यवाही का सामना कर रहे सिक्किम उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पीडी. दिनकरन को मंगलवार को सर्वोच्च न्यायालय से थोड़ी खुशी, थोड़ा गम मिला। शीर्ष अदालत ने राज्यसभा के सभापति व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी द्वारा आरोपों की जांच के लिए गठित तीन सदस्यीय समिति से वरिष्ठ अधिवक्ता पीपी राव को हटाने की दिनकरन की मांग तो मान ली, लेकिन अभी तक की जांच निरस्त करने और जांच समिति का आदेश खारिज करने की मांग ठुकरा दी। साथ ही दिनकरन मंशा पर भी सवाल उठाते हुए कहा, उन्होंने जानबूझकर जांच लटकाने के इरादे से राव के समिति में शामिल होने पर देरी से सवाल उठाया। अदालत के इस फैसले के साथ ही दिनकरन के खिलाफ जांच पर लगी रोक भी हट गयी है। राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने दिनकरन पर लगे आरोपों की जांच के लिए जनवरी 2010 में तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की है। सुप्रीमकोर्ट के न्यायाधीश आफताब आलम समिति के अध्यक्ष हैं, जबकि कर्नाटक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जेएस खेर और सुप्रीमकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता पीपी राव सदस्य हैं। न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी व चंद्रमौलि प्रसाद की पीठ ने जांच समिति का गत 24 अप्रैल का आदेश निरस्त करने की जस्टिस दिनकरन मांग ठुकरा दी। हालांकि पीठ ने राव पर पक्षपाती होने के आरोप को देखते राज्यसभा सभापति से अनुरोध किया है कि वे जांच समिति में पीपी राव की जगह किसी और प्रख्यात कानूनविद को शामिल करें। कोर्ट ने साफ किया कि दिनकरन के खिलाफ उच्च सदन द्वारा पारित नोटिस ऑफ मोशन में तय किए गए 12 आरोपों की जांच शुरू से नहीं होगी, बल्कि जहां तक जांच हो चुकी है उसके आगे से होगी। आरोप तय होने के स्तर से ही जांच शुरू होगी। अभी जांच समिति को आरोपों पर निर्णय लेना है, इसलिए जांच समिति में दूसरे कानूनविद के शामिल होने से जांच का काम प्रभावित नहीं होगा। पीठ ने कहा, याचिकाकर्ता (जस्टिस दिनकरन) चतुर व्यक्ति है। उसे मालूम है कि न्यायाधीश जांच नियम 1969 के तहत आरोप तय होने के तीन माह के भीतर जांच समिति के अध्यक्ष को अपनी रिपोर्ट सभापति को सौंपनी पड़ती है, इसलिए वह रिपोर्ट में देरी की हर संभव कोशिश कर रहा है। यह याचिका सिर्फ देरी करने के इरादे से दाखिल की गयी है। कोर्ट ने कहा, दिनकरन को बहुत पहले मालूम था कि राव समिति के सदस्य हैं, लेकिन उन्होंने शुरू में इस पर आपत्ति नहीं उठाई|

गरीबों को खदेड़ रहीं सरकारें


 सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों की भू अधिग्रहण नीति पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा है कि सरकारें इसे दमन यंत्र की तरह इस्तेमाल कर रही हैं। किसानों से जमीन लेकर बिल्डरों को दिए जाने पर एतराज जताते हुए कोर्ट ने यहां तक कहा कि आखिर भू स्वामियों को क्या मिला? सिवाय मुकदमेबाजी और लाठियां। पुरुष जेल गए और महिलाओं से दु‌र्व्यवहार हुआ। कोर्ट ने ये तीखी टिप्पणियां ग्रेटर नोएडा में भूमि अधिग्रहण के एक मामले में सुनवाई के दौरान कीं। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ग्रेटर नोएडा के सहबरी गांव की भूमि का अधिग्रहण निरस्त कर दिया था। इस पर उत्तर प्रदेश सरकार, ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण और बिल्डरों ने सुप्रीमकोर्ट में याचिकाएं दाखिल कर हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी। न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी व एके गांगुली की पीठ ने मंगलवार को सुनवाई के दौरान सरकार की भू अधिग्रहण नीति को जनविरोधी कहा और आपात उपबंध के गलत इस्तेमाल पर भी उत्तर प्रदेश सरकार की कड़ी खिंचाई की। कोर्ट ने राज्य सरकार से कहा कि विकास के नाम पर वह क्या कर रही है? किसानों की खेतिहर जमीन मल्टीप्लेक्स और मॉल आदि बनाने के लिए अधिग्रहीत की जा रही है, जो आम आदमी की पहंुच से दूर हैं। कोर्ट ने कहा कि अगर सरकार नहर, पुल आदि बनाने के लिए जमीन अधिग्रहीत करती तो समझ आता, लेकिन यहां जो जमीन मॉल, होटल और टाउनशिप के लिए ली गई है। सरकार और बिल्डर दलील दे रहे हैं कि यह रिहायशी एरिया जरूरतमंदों के लिए विकसित किया जा रहा है। बिल्डरों के ब्रोशरों का जिक्र करते हुए अदालत ने कहा स्पॉ, स्विमिंग पूल, आयुर्वेदिक मसाज, हेल्थ क्लब वाले ये फ्लैट क्या गरीबों के लिए बन रहे हैं? जिनकी जमीने ली गई हैं क्या वे इन्हें ले पाएंगे? पीठ ने कहा कि अन्य राज्यों में भी यही है। राज्य सरकारें गरीबों को खदेड़ रही हैं। वे कुटिल अभियान चला रही हैं और जनविरोधी काम कर रही हैं। कोर्ट ने कहा कि जमीन किसान की मां होती है। एक किसान से जमीन लेने पर सिर्फ उसी के जीवन यापन का साधन नहीं जाता, बल्कि उसकी पांच पीढि़यों की रोजी रोटी जाती है और उसे उसके बदले क्या मिलता है- थोड़ा सा मुआवजा, जिसे वह मुकदमेबाजी में खर्च करता है। बिल्डरों के वकीलों ने दलील दी कि ज्यादातर भू स्वामियों ने मुआवजा ले लिया है तो कोर्ट ने कहा कि अगर वे मुआवजा नहीं लेते तो उनके पास और क्या विकल्प था? सरकारें उनकी जमीनें हड़प कर उन्हें गुलाम बना रहीं हैं। यह ग्लोबलाइजेशन नहीं, मार्जिनलाइजेशन है। सरकार किसानों को हाशिये पर डाल रही है। कोर्ट ने जब यूपी सरकार से आपात उपबंध लगाकर भू स्वामियों से आपत्ति का हक छीनने पर सवाल किया तो सरकार का जवाब था कि कालोनाइजर गैरकानूनी ढंग से भूमि के छोटे-छोटे टुकड़े बेंच रहे थे। अगर आपात उपबंध लगा कर जमीन न ली जाती तो ग्रेटर नोएडा में भी दिल्ली की तरह अवैध कालोनी बन जाती। पीठ ने सरकार के जवाब पर नाराजगी जताते हुए कहा कि वह गैरकानूनी जमीन स्थानांतरण को दूसरे तरीके से रोक सकती थी। राज्य सरकार अपनी प्रशासनिक अक्षमता को इससे नहीं ढक सकती। सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत के बगैर यह गैरकानूनी काम नहीं हो सकता। बिल्डरों से दस हजार रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर से कीमत ली गई और भू स्वामियों को मात्र आठ सौ रुपये वर्गगज से मुआवजा दिया गया। यह ठीक है कि संपत्ति का अधिकार संवैधानिक अधिकार नहीं है, लेकिन यह जीवन के अधिकार के तहत आता है। बहस कल भी जारी रहेगी। वैसे पीठ ने यह स्पष्ट कर दिया कि वह उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक नहीं लगाने जा रही। 

Saturday, July 2, 2011

दो शिफ्टों में काम करेंगी अदालतें


कानून मंत्रालय ने लोगों को त्वरित न्याय दिलाने तथा विभिन्न अदालतों में लंबित 2.79 करोड़ मामलों के त्वरित निपटारे के लिए शुक्रवार से देश में नेशनल मिशन मोड नामक महत्वाकांक्षी कार्यक्रम शुरू किया है। इतना ही नहीं, मुकदमों की संख्या कम करने के लिए सरकार अदालती कामकाज दो पालियों (शिफ्ट) में प्रारंभ करने के बारे में सोच रही है। इसके लिए अतिरिक्त न्यायाधीशों व अन्य कर्मचारियों की व्यवस्था का रास्ता तलाशा जा रहा है। कानून मंत्री एम वीरप्पा मोइली ने शुक्रवार को कलकत्ता हाईकोर्ट के 150 वर्ष पूरा होने के अवसर पर नेशनल मिशन मोड कार्यक्रम का उद्घाटन किया। इस मौके पर मोइली ने कहा, इस वक्त पूरे देश में करीब 2.79 करोड़ मामले लंबित हैं। मामलों की संख्या प्रतिदिन बढ़ रही है, जिससे फैसले लटक रहे हैं। इसीलिए अदालती कामकाज दो पालियों में शुरू करने की योजना है। इसके लिए कई जज और कर्मचारियों की आवश्यकता होगी, जिसे दूर करने की कोशिश की जा रही है। हम लोगों का मिशन है कि मामले का त्वरित निपटारा हो और लोगों को जल्द न्याय मिले। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा, त्वरित न्याय के लिए अत्याधुनिक तकनीक विकसित करने के साथ ही अदालतों को संसाधनों से लैस करना होगा। उद्योग को लेकर पूरे देश में जो मामले चल रहे हैं उसका तत्काल निस्तारण होना चाहिए। राज्यपाल एमके नारायणन ने कहा, संविधान में सभी के अधिकारों की रक्षा का उल्लेख है। इसीलिए हमारे देश की न्याय व्यवस्था सबसे अधिक सुदृढ़ व विकसित है। इस मौके पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा, देरी से फैसला आना न्याय न मिलने के बराबर है। इसलिए मुकदमों का शीघ्रता से निपटारा होना चाहिए। उन्होंने कहा, सूबे के 191 फास्ट ट्रैक कोर्ट न्यायाधीशों के न होने से बंद हो गए। नये जज नियुक्त कर इन्हें फिर से शुरू करने की योजना है। उन्होंने कहा, वकील आज भी पेड़ के नीचे बैठ कर कामकाज करते हैं। उनके लिए ग्रेच्यूटी और पीएफ नहीं है। बंगाल सरकार वकीलों के लिए पायलट परियोजना तैयार कर रही है, ताकि ब्रेड, मक्खन के साथ रहने का स्थान उपलब्ध हो। वकीलों के आवास के लिए जमीन देखी जा रही है, जहां एक साथ सभी अधिवक्ता सपरिवार रह सकेंगे|

Wednesday, June 29, 2011

मुठभेड़ के नाम पर मनमानी नहीं कर सकती सेना


फर्जी मुठभेड़ मामलों में आपराधिक मुकदमों से सेना तथा अ‌र्द्धसैनिक बलों के जवानों को छूट पर केंद्र के पूरी तरह भिन्न विचारों से खफा सर्वोच्च न्यायालय ने गुरुवार को सरकार से विवादास्पद सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम तथा अन्य कानूनों पर रुख स्पष्ट करने को कहा। अदालत ने कहा, आप यह नहीं कह सकते कि सेना का कोई जवान किसी घर में घुस सकता है, बलात्कार कर सकता है और कहे कि उसे छूट प्राप्त है क्योंकि उसने आधिकारिक काम करते हुए ऐसा किया है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह सख्त टिप्पणी फर्जी मुठभेड़ मामले में केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक भान की दलील सुनने के बाद दी। भान ने जम्मू कश्मीर तथा असम में सैन्यकर्मियों द्वारा मुठभेड़ में लोगों के मारे जाने के दो मामलों में अलग अलग विचार रखे थे। भाग ने 2004 में जम्मू कश्मीर के छत्तीसिंहपुरा मुठभेड़ मामले (सात युवकों को कथित मुठभेड़ में मारे जाने)के आरोपी राष्ट्रीय रायफल्स के जवानों पर मुकदमे की मांग की। वहीं असम के गोलाघाट इलाके में 1983 में सीआरपीएफ के जवानों द्वारा उल्फा आंतकियों के नाम पर छह लोगों को कथित रूप से कत्ल किए जाने के मामले में जवानों को छूट मिलने की दलील दी। पीठ ने कहा, आप एक ही प्रकृति के मामले में पूरी तरह अलग अलग रुख कैसे व्यक्त कर सकते हैं। इस पर भान ने पेशेवर जिम्मेदारियों की बाध्यता का हवाला देते हुए अदालत से दोनों मुद्दों को अलग करने तथा उन पर अलग अलग विचार करने का अनुरोध किया। बहरहाल पीठ ने कहा कि मामले में जनता से संबंधित कानून के सवाल जुड़े हुए हैं इसलिए अवकाश के बाद तत्काल इसे विस्तृत सुनवाई के लिए लिया जाएगा। शीर्ष अदालत ने दोनों मुद्दों पर केंद्र सरकार से दो सवालों का जवाब मांगा। इनमें पहला यह कि क्या सेना और अ‌र्द्धसैनिक बलों के जवानों को आधिकारिक जिम्मेदारियां निभाते वक्त किए गए किसी दंडात्मक कृत्य के लिहाज से कानूनों के तहत आपराधिक मुकदमे से छूट प्राप्त है, जिसमें फर्जी मुठभेड़ और बलात्कार भी शामिल हैं। दूसरा, क्या सीबीआई जैसी जांच एजेंसियों को सेना और अ‌र्द्धसैनिक बलों के आरोपी जवान के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने से पहले इस तरह की मुठभेड़ के मामलों में प्रारंभिक जांच करनी चाहिए।

Friday, April 15, 2011

भ्रष्ट जजों पर कसेगा शिकंजा


न्यायालय के जजों के भ्रष्टाचार के कारनामों पर भी अब अंकुश लगाना संभव हो पाएगा। वे भी कानून से बच नहीं पाएंगे। केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री डॉ. एम विरप्पा मोइली ने बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर केंद्रीय विश्वविालय में आयोजित पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए कहा कि इस कार्यप्रणाली पर कार्य चल रहा है जिससे भ्रष्ट जजों पर भी कार्रवाई करना आसान हो सकेगा। 

संविधान में दिए 1964 एक्ट के तहत यह संभव हो सकेगा। कुछ बदलाव के साथ संसद में पास होने के बाद इसे कानून का रूप दे दिया जाएगा। इससे वे लोग जो पहले से भ्रष्टाचार में लिप्त हैं जज की कुर्सी पर काबिज नहीं हो पाएंगे और जो जज भ्रष्टाचार में लिप्त होंगे उन्हें बख्शा नहीं जाएगा। उन्होंने कहा कि भारतीय न्यायिक प्रक्रिया में सुधार लाने के लिए युद्ध स्तर पर कवायद चल रही है। न्यायालय में रिक्त पड़े पदों को भरने के प्रयास तेजी से किए जा रहे हैं। इसके साथ ही केंद्र सरकार ने समानांतर न्यायालय चलाने की व्यवस्था की है। राजस्थान और मध्य प्रदेश में यह काफी लोकप्रिय भी हो रहा है। ग्रामीण न्यायालय व 13वीं फाइनेंस कमीशन के लिए 5-5 करोड़ और लीगल कमीशन के लिए 7.50 करोड़ रुपए की व्यवस्था की गई है। इन तीनों व्यवस्था के तहत काफी वादों को उसी स्तर पर निपटारे में सफलता मिल रही है। यह मोबाइल न्यायालय की तरह कार्य करते हैं और काफी प्रभावी सिद्घ हो रहे हैं। प्रदेश सरकार से भी उन्होंने यह आशा की है कि वे इस व्यवस्था को अपनाने में सहयोग प्रदान करें। इसके साथ ही लोक अदालत फास्ट ट्रैक न्यायालय के तहत भी काफी लंबित वादों को निपटाया जा रहा है। कोशिश यही है कि इस न्यायिक प्रक्रिया के तहत भ्रष्टाचार के लंबित मामलों का एक वर्ष के भीतर ही निपटारा कर दिया जाए। 

दूसरी ओर केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री डॉ. एम विरप्पा मोइली ने बताया कि अब भारत का कोई भी नागरिक न्याय पाने से वंचित नहीं होगा। न्याय पाना हर किसी का अधिकार है। इसलिए केंद्र सरकार सूचना के अधिकार की तर्ज पर न्याय का अधिकार कानून लागू करने पर तेजी से कार्य कर रही है। इस व्यवस्था के लिए मसौदा तैयार करने का प्रथम चरण पूरा हो चुका है। ड्रॉफ्ट तैयार होने के पश्चात बिल को संसद में पेश किया जाएगा और पास होने के पश्चात कानून के रूप में लागू कर दिया जाएगा। इस पर ज्यादा कुछ अपनी टिप्पणी न देते हुए उन्होंने कहा कि जब यह कानून लागू होगा तो सभी आम नागरिकों के लिए केंद्र सरकार की वेबसाइट पर इसे सार्वजनिक कर दिया जाएगा|

Monday, March 28, 2011

एससी-एसटी के लिए बनाएं विशेष कोर्ट


 अनुसूचित जाति और जनजाति पर बढ़ते अत्याचार और अदालत में मामलों की धीमी सुनवाई पर गंभीर रुख अपनाते हुए केंद्र सरकार ने सभी राज्यों से कहा है कि वे विशेष अदालतें गठित करें। केंद्र ने यह फैसला सामाजिक संगठनों के बार-बार सरकार को इन समुदायों पर हो रहे अत्याचारों और उनकी धीमी सुनवाई के बारे में बताने के बाद लिया है। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री मुकुल वासनिक ने रविवार को यहां मीडिया को बताया, केंद्र ने सभी राज्यों को विशेष अदालत गठित करने के निर्देश दे दिए हैं। कई राज्यों ने तो ऐसी अदालत गठित करने की घोषणा भी कर दी है। वासनिक ने माना कि इन समुदायों के मामलों की सुनवाई की दर काफी धीमी है और 81 प्रतिशत से ज्यादा मामले अदालतों में लंबित हैं। नेशनल क्राइम ब्यूरो (एनसीबी) के ताजा आंकड़ों के अनुसार 1995 से 2009 के बीच अनुसूचित जनजाति पर अत्याचारों के 80,489 मामले पाए गए। इनमें 1,911 हत्या और 7,537 बलात्कार के मामले थे। हालांकि एनसीबी ने अनुसूचित जाति के मामले में कोई जानकारी नहीं दी है। बजट सत्र के दौरान संसद में पेश एक रिपोर्ट के अनुसार केवल 2008 में 30,913 मामले दर्ज किए गए हैं। अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण कानून के प्रतिपादक और पूर्व आइएएस अधिकारी पीएस कृष्णा का कहना है, समस्या केवल अदालत में बड़ी संख्या में मामलों का लंबित होना ही नहीं है, बल्कि इन पर सुनवाई करने वाले जजों और वकीलों की संख्या की कमी भी है। उन्होंने कहा, अनुसूचित जनजाति के लोगों को सार्वजनिक अदालतों में काफी समस्या होती है क्योंकि ज्यादातर लोग उनकी भाषा नहीं समझ पाते। कृष्णा के अनुसार, इस समय की सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि ऐसे समुदाय के लोग ही वकालत करके आएं, जिन्हें उनकी भाषा की समझ के साथ उनके अधिकार से संबंधी पूरी जानकारी हो। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2009 के अंत तक 15,909 आपराधिक मामले कोर्ट में लंबित थे। जिन राज्यों में इन समुदायों पर सबसे ज्यादा अत्याचार के मामले सामने आए, उनमें उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, झारखंड और उड़ीसा शामिल हैं|

Monday, March 21, 2011

तुरंत रेल ट्रैक खाली कराएं यूपी और केंद्र सरकार : हाईकोर्ट


जाटों के रेल रोको आंदोलन के कारण 14 दिनों से ट्रेन यातायात बाधित होने और आमजन को हो रही दुश्वारी पर इलाहाबाद हाईकोर्ट और उसकी लखनऊ पीठ ने शुक्रवार को सख्त रुख अपनाया। लखनऊ पीठ ने इस मामले का स्वत: संज्ञान लिया, जबकि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद केंद्र व राज्य सरकार को आदेश दिया है कि वह पर्याप्त फोर्स लगाकर ट्रैक तुरंत खाली कराए,ताकि ट्रेनों का आवागमन शुरू हो सके। सड़क जाम कर रहे आंदोलनकारियों को भी हटाया जाए। साथ ही अधिकारियों को आगाह किया कि वे ऐसा करने में नाकाम रहे तो सारी जिम्मेदारी उन्हीं की होगी। अदालत के निर्देश के बाद केंद्र और राज्य सरकार हरकत में आ गईं हैं। राज्य के कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह ने बताया कि सरकार आदेश अनुपालन सुनिश्चित कराएगी। मुख्यमंत्री मायावती ने प्रमुख सचिव गृह व डीजीपी के साथ बैठक की। साथ ही केंद्रीय गृह मंत्री को पत्र लिखकर मामले के शीघ्र समाधान का अनुरोध किया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने जाट आंदोलन से निपटने की रणनीति बनाने के लिए शनिवार को दिल्ली में रेलवे व अ‌र्द्धसैनिक बल के आला अफसरों की बैठक आहूत की है। लखनऊ पीठ के मुख्य न्यायाधीश एफआई रिबेलो और देवीप्रसाद सिंह की खंडपीठ ने शुक्रवार को समाचार पत्रों में जाट आंदोलनकारियों द्वारा रेलमार्ग जाम रखने की छपी खबरों का स्वत: संज्ञान लेते हुए मामले को न्यायमूर्ति उमानाथ सिंह की अध्यक्षता वाली पीठ के पास भेज दिया। पीठ के तलब करने पर सायं साढ़े चार बजे प्रदेश के प्रमुख सचिव गृह और डीजीपी अदालत में उपस्थित हुए। राज्य सरकार के महाधिवक्ता ज्योतिन्द्र मिश्रा ने पीठ को बताया कि केंद्र सरकार को इस मामले में पहल करनी होगी। केंद्र की ओर से एडीशनल सालीसीटर जनरल डा.अशोक निगम ने पक्ष प्रस्तुत किया। पीठ ने दोनों को सुनने के बाद कहा, नागरिकों को आंदोलन का हक है, किंतु उन्हें जनता को कठिनाइयों में डालने का हक नहीं है। जाट आंदोलन के कारण आवागमन बाधित न हो। इसके लिए केंद्र व राज्य सरकार आवश्यक सुरक्षा बल मुहैया कराकर ट्रेनों का सुचारू संचालन सुनिश्चत करें। पीठ इस मामले पर 23 मार्च को फिर सुनवाई करेगी और यह जानेगी कि उसके आदेश पर कितना अमल हुआ? वहीं, इलाहाबाद हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति इम्तियाज मुर्तजा व एसएस तिवारी की खंडपीठ ने कु.भारती कश्यप की जनहित याचिका पर केंद्रीय गृह सचिव, उप्र के गृह सचिव, राज्य के पुलिस प्रमुख और रेलवे बोर्ड के चेयरमैन, लखनऊ और दिल्ली के महाप्रबंधकों को निर्देश दिया कि वे ट्रैक खाली कराने व ट्रेनों के सुचारु संचालन के लिए त्वरित कार्रवाई करें। साथ ही कार्यवाही की रिपोर्ट 29 मार्च को अगली सुनवाई की तिथि पर पेश करने का निर्देश दिया है।

Tuesday, March 15, 2011

दोस्ती को भारत के बंदी छोड़े पाक


एक असामान्य कदम के तहत उच्चतम न्यायालय ने पाकिस्तान से अपील की कि दोनों देशों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों को प्रोत्साहन देने के लिए वह वहां के विभिन्न जेलों में बंद भारतीय कैदियों को रिहा करे। न्यायाधीश ने उर्दू के प्रसिद्ध शायर फैज अहमद फैज की प्रसिद्ध ये पंक्तियां भी उद्धृत कीं-कफस उदास है यारों, सबा से कुछ तो कहो। कहीं तो बहर-ए-खुदा आज जिक्र-ए-यार चले। न्यायमूर्ति मार्कंडेय काट्जू और ज्ञान सुधा मिश्रा की पीठ ने कहा कि वह सिर्फ उनकी रिहाई के लिए पाकिस्तान सरकार से अपील कर सकती है, क्योंकि भारतीय अदालतों के पास अन्य देशों को निर्देश देने की कोई शक्ति नहीं है। पीठ ने कहा, हम पाकिस्तानी अधिकारियों को कोई निर्देश नहीं दे सकते, क्योंकि हमारा उनके ऊपर अधिकार नहीं है। भारतीय अधिकारियों ने इस मामले में जो कुछ भी किया जा सकता है वह सब कुछ किया है। हालांकि, यह हमें याचिकाकर्ता की अपील पर विचार करने के लिए पाकिस्तानी अधिकारियों से अनुरोध करने से नहीं रोक सकता कि उसकी शेष सजा को माफ कर उसे मानवीय आधार पर रिहा कर दिया जाए। शीर्ष अदालत के अनुसार,हम पाकिस्तानी अधिकारियों से इस बात की अपील करने को उचित मानते हैं कि वह याचिकाकर्ता को मानवीय आधार पर रिहा कर दे, क्योंकि उसने जेल में करीब 27 साल बिता लिए हैं। अदालत ने यह आदेश गोपाल दास के परिवार की ओर से दायर याचिका का निस्तारण करते हुए पारित किया। गोपाल दास के परिवार के सदस्यों ने अपनी याचिका में शिकायत की थी कि अपनी सजा काटने के बावजूद दास 27 वर्षों से जेल में बंद हैं। केंद्र की ओर से दास और ऐसे ही अन्य कैदियों की रिहाई के लिए उठाए गए कदमों के संबंध में दायर जवाबी हलफनामे का परीक्षण करने के बाद पीठ ने कहा कि वह मानवीय आधार पर भारतीय मूल के सभी अन्य कैदियों को रिहा करने पर विचार करे|

Thursday, March 10, 2011

सुप्रीम कोर्ट से ठुकराई याचिकाएं सुन सकता है हाईकोर्ट


सर्वोच्च न्यायालय ने एक अहम फैसले में व्यवस्था दी है कि उसकी टिप्पणियों को कानून या मिसाल नहीं माना जाना चाहिए। शीर्ष न्यायालय ने विशेष अनुमति याचिका खारिज किए जाने के बावजूद हाईकोर्ट में समीक्षा याचिका दायर की जा सकता है। न्यायमूर्ति मार्कण्डेय काटजू और ज्ञान सुधा मिश्रा ने बुधवार को आंध्र प्रदेश के गंगाधर की याचिका पर दिए फैसले में कहा, सुप्रीम कोर्ट द्वारा विशेष अनुमति याचिका खारिज करने के बावजूद अगर हाईकोर्ट किसी समीक्षा याचिका को स्वीकार कर लेता है, तो शीर्ष न्यायालय को इससे खुद को तिरस्कृत महसूस नहीं करना चाहिए। न्यायालय ने कहा, हमारा मानना है कि इन निष्कर्षो को मिसाल के तौर पर कतई नहीं देखा जाना चाहिए। हम तिरस्कार से नहीं डरते। इस बात को देखना जरूरी है कि विधिक सिद्धांत का निर्धारण किया गया है या नहीं। पीठ ने कहा, इस न्यायालय के छिटपुट निष्कर्षो को मिसाल नहीं माना जाना चाहिए। पीठ ने कहा, शीर्ष अदालत के किसी फैसले से संविधान समीक्षा का अधिकार लुप्त नहीं हो जाता। शीर्ष अदालत के आदेश संविधान में परिवर्तन करने की शक्ति नहीं रखते। न्यायाधीश ने कहा, भारतीय संविधान का अनुच्छेद 136 विवेकाधीन प्रतिकार का हक देता है। इसे विभिन्न तर्को के आधार पर खारिज किया जा सकता है न की वरीयता के आधार पर|

Monday, March 7, 2011

इच्छामृत्यु वैध, लेकिन अरुणा को नहीं


सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कानून में नई व्यवस्था देते हुए ब्रेन डेड मरीज का जीवन रक्षक उपकरण व इलाज हटा कर परोक्ष इच्छा मृत्यु या दया मृत्यु देने की इजाजत दे दी है। दूरगामी प्रभाव वाले फैसले में कोर्ट ने परोक्ष इच्छा मृत्यु के लिए दिशानिर्देश तय करते हुए कहा है कि जब तक संसद इस बाबत कानून नही बनाती यह फैसला लागू रहेगा। हालांकि कोर्ट ने 38 साल से बिस्तर पर पड़ी मंुबई की नर्स अरुणा रामचंद्र शानबाग को इच्छा मृत्यु दिए जाने की मांग खारिज कर दी। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद भारत उन देशों में शामिल हो गया है जहां किसी न किसी रूप में इच्छा मृत्यु या दया मृत्यु की इजाजत है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने सीधेतौर (एक्टिव) पर विषाक्त इंजेक्शन आदि लगा कर इच्छा मृत्यु दिए जाने की अनुमति नहीं दी है। परोक्ष इच्छा मृत्यु के लिए भी हाईकोर्ट से मंजूरी लेनी अनिवार्य होगी। नई कानूनी व्यवस्था देने वाला यह अहम फैसला न्यायमूर्ति मार्केंडेय काटजू व न्यायमूर्ति ज्ञान सुधा मिश्रा की पीठ ने सुनाया है। पीठ ने कहा कि वे वरिष्ठ अधिवक्ता अध्यार्जुना की दलील से सहमत हैं कि में हमारे देश में विशेष परिस्थितियों में परोक्ष इच्छा मृत्यु की इजाजत होनी चाहिए। पीठ ने इसका विरोध करने वाले अटार्नी जनरल जीई वाहनवती की दलील ठुकरा दी। परोक्ष इच्छा मृत्यु की अनुमति के दिशा निर्देश तय करते हुए पीठ ने कहा कि मरीज के माता पिता, जीवनसाथी, अन्य रिश्तेदार और इन लोगों के न होने पर निकट मित्र या इलाज करने वाला डाक्टर जीवन रक्षक उपकरण या इलाज हटाने का फैसला कर सकता है। पीठ ने कहा कि अरुणा के बारे में यह फैसला करने का हक केईएम अस्पताल स्टाफ को है जो पिछले 38 सालों से उसकी देखभाल करता आ रहा है और स्टाफ चाहता है कि अरुणा को जीने दिया जाए। याचिकाकर्ता पिंकी विरानी को अरुणा के बारे में फैसला करने का हक नहीं है। कोर्ट ने कहा कि अगर भविष्य में केईएम अस्पताल स्टाफ अपना विचार बदलता है तो उस स्थिति में उसे अरुणा का जीवन रक्षक इलाज हटाने से पहले बंबई हाईकोर्ट से अनुमति लेनी होगी। पीठ ने अन्य मामलों में भी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि भले ही मरीज का जीवन रक्षक इलाज हटाने का सगे संबंधियों या निकट मित्र ने फैसला कर लिया हो, लेकिन उसके लिए हाईकोर्ट से मंजूरी लेनी जरूरी होगी। हाईकोर्ट से मंजूरी की शर्त लगाने का कारण साफ करते हुए पीठ ने कहा कि दुरुपयोग की संभावनाओं को देखते हुए हाईकोर्ट से मंजूरी लेना मरीज, परिवार और समाज के हित में होगा|