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Friday, April 15, 2011

भ्रष्ट जजों पर कसेगा शिकंजा


न्यायालय के जजों के भ्रष्टाचार के कारनामों पर भी अब अंकुश लगाना संभव हो पाएगा। वे भी कानून से बच नहीं पाएंगे। केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री डॉ. एम विरप्पा मोइली ने बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर केंद्रीय विश्वविालय में आयोजित पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए कहा कि इस कार्यप्रणाली पर कार्य चल रहा है जिससे भ्रष्ट जजों पर भी कार्रवाई करना आसान हो सकेगा। 

संविधान में दिए 1964 एक्ट के तहत यह संभव हो सकेगा। कुछ बदलाव के साथ संसद में पास होने के बाद इसे कानून का रूप दे दिया जाएगा। इससे वे लोग जो पहले से भ्रष्टाचार में लिप्त हैं जज की कुर्सी पर काबिज नहीं हो पाएंगे और जो जज भ्रष्टाचार में लिप्त होंगे उन्हें बख्शा नहीं जाएगा। उन्होंने कहा कि भारतीय न्यायिक प्रक्रिया में सुधार लाने के लिए युद्ध स्तर पर कवायद चल रही है। न्यायालय में रिक्त पड़े पदों को भरने के प्रयास तेजी से किए जा रहे हैं। इसके साथ ही केंद्र सरकार ने समानांतर न्यायालय चलाने की व्यवस्था की है। राजस्थान और मध्य प्रदेश में यह काफी लोकप्रिय भी हो रहा है। ग्रामीण न्यायालय व 13वीं फाइनेंस कमीशन के लिए 5-5 करोड़ और लीगल कमीशन के लिए 7.50 करोड़ रुपए की व्यवस्था की गई है। इन तीनों व्यवस्था के तहत काफी वादों को उसी स्तर पर निपटारे में सफलता मिल रही है। यह मोबाइल न्यायालय की तरह कार्य करते हैं और काफी प्रभावी सिद्घ हो रहे हैं। प्रदेश सरकार से भी उन्होंने यह आशा की है कि वे इस व्यवस्था को अपनाने में सहयोग प्रदान करें। इसके साथ ही लोक अदालत फास्ट ट्रैक न्यायालय के तहत भी काफी लंबित वादों को निपटाया जा रहा है। कोशिश यही है कि इस न्यायिक प्रक्रिया के तहत भ्रष्टाचार के लंबित मामलों का एक वर्ष के भीतर ही निपटारा कर दिया जाए। 

दूसरी ओर केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री डॉ. एम विरप्पा मोइली ने बताया कि अब भारत का कोई भी नागरिक न्याय पाने से वंचित नहीं होगा। न्याय पाना हर किसी का अधिकार है। इसलिए केंद्र सरकार सूचना के अधिकार की तर्ज पर न्याय का अधिकार कानून लागू करने पर तेजी से कार्य कर रही है। इस व्यवस्था के लिए मसौदा तैयार करने का प्रथम चरण पूरा हो चुका है। ड्रॉफ्ट तैयार होने के पश्चात बिल को संसद में पेश किया जाएगा और पास होने के पश्चात कानून के रूप में लागू कर दिया जाएगा। इस पर ज्यादा कुछ अपनी टिप्पणी न देते हुए उन्होंने कहा कि जब यह कानून लागू होगा तो सभी आम नागरिकों के लिए केंद्र सरकार की वेबसाइट पर इसे सार्वजनिक कर दिया जाएगा|

अपराध से जुडे़ किसी भी स्थान पर चलेगा केस


सुप्रीम कोर्ट ने थाना-कचहरी का सीमा विवाद समाप्त करने वाला एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि अगर कोई अपराध एक स्थान से शुरू होकर लगातार दूसरे स्थान तक जारी रहता है तो उसका मुकदमा घटना से जुड़े किसी भी स्थान पर चलाया जा सकता है। यानि अगर पति या ससुराल वाले विवाहिता को प्रताडि़त करते हैं और उसी प्रताड़ना के क्रम में डरा-धमका कर मायके छोड़ जाते हैं तो मुकदमा ससुराल या मायके के किसी भी स्थान की अदालत में चल सकता है। पीडि़तों को राहत पहंुचाने वाला यह फैसला न्यायमूर्ति पी. सथाशिवम व न्यायमूर्ति बीएस चौहान की पीठ ने सुनाया है। कोर्ट ने दहेज प्रताड़ना की शिकार बिहार की रहने वाली सुनीता कश्यप की याचिका स्वीकार कर ली है और क्षेत्राधिकार के आधार पर उसके पति के खिलाफ दहेज का मुकदमा निरस्त करने का पटना हाईकोर्ट का फैसला खारिज कर दिया। कोर्ट ने गया की अदालत को सुनीता के पति संजय कुमार सैनी के खिलाफ लंबित आपराधिक मामले पर कानून के मुताबिक कार्यवाही करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि सुनीता की शिकायत देखने से पता चलता है कि उसके प्रति पति और ससुराल वालों की क्रूरता रांची में शुरू होती है और उसी क्रम में उसका पति दहेज की मांग पूरी न होने पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी देकर उसे मायके गया छोड़ जाता है। इस मामले में अपराध एक से अधिक थाना क्षेत्र में घटित हुआ है। अपराध घटित होने वाले स्थानों में गया भी है इसलिए गया की अदालत में मुकदमा चल सकता है। सुनीता की याचिका के मुताबिक उसकी शादी वर्ष 2000 में रांची निवासी संजय कुमार सैनी के साथ हुई। शादी के बाद से ही उसे दहेज के लिए प्रताडि़त किया जाने लगा। पहले उसके पति ने मकान ठीक कराने के लिए पिता से 4 लाख रुपये लाने का दबाव डाला और उसे मायके छोड़ गया और बाद कहा कि जब तक उसके पिता गया का मकान उसके नाम नहीं करते वह सुनीता को रांची वापस नहीं ले जाएगा। अंत में प्रताड़ना से ऊब कर सुनीता ने 2007 में पति और ससुराल वालों के खिलाफ गया के मगध मेडिकल कॉलेज थाने में शिकायत दर्ज कराई और गया की अदालत ने पति और ससुराल वालों के खिलाफ दहेज प्रताड़ना के मामले में संज्ञान लिया और ट्रायल शुरू किया। सुनीता के पति ने गया अदालत की कार्यवाही को क्षेत्राधिकार के आधार पर चुनौती दी। उसका कहना था कि मुकदमा तो रांची में चल सकता है क्योंकि घटना वहां की है। पटना हाईकोर्ट ने उसकी दलील स्वीकार करते हुए गया की अदालत में चल रहा मुकदमा खारिज कर दिया था|