हम कोटा के वकील पिछले दिनों हड़ताल पर थे। लगभग डेढ़ माह के बाद कचहरी में काम आरंभ हुआ। एक बार जब कोई नियमित गतिविधि को लंबा विराम लगता है तो उसे फिर से नियमितता प्राप्त करने में समय लगता है। काम फिर से गति पकड़ने लगा था कि एक वरिष्ठ वकील के देहांत के कारण फिर से काम की गति अवरुद्ध हुई। दोपहर बाद अदालत के कामों से फुरसत पा कर निकला ही था कि एक वकील मुझे मिल गए। दो मिनट के लिए बात हुई। कहने लगे मुश्किल से अदालती काम गति पकड़ने लगा था कि आज फिर से बाधा आ गई। मैंने भी उनसे सहमति जताई और कहा कि यदि कोई बाधा न हुई तो इस सप्ताह के अंत तक अदालतों का काम अपनी सामान्य गति पा लेगा। उन्होंने कहा कि वह जिला जज के सामने एक मुकदमे में बहस के लिए उपस्थित हुए थे, लेकिन खुद जज साहब ने बहस सुनने से मना कर दिया और कहा कि आज तो शोकसभा हो गई है बहस तो नहीं सुनेंगे। दूसरे काम निपटाएंगे। बात निकली थी तो मैंने उन्हें पूछा कि एक अदालत के पास मुकदमे कितने होने चाहिए? उन्होंने कहा कि एक दिन की कार्य सूची में एक अदालत के पास दस दीवानी और दस फौजदारी मुकदमे ही होने चाहिए, तभी साफ सुथरा काम संभव है। मुझे अपने सवाल का पूरा उत्तर नहीं मिला था। मैंने तुरंत सवाल दागा एक मुकदमे में दो सुनवाइयों के बीच कितना अंतर होना चाहिए? उनका उत्तर था कि हर मुकदमे में हर माह कम से कम एक सुनवाई तो अवश्य ही होनी चाहिए। मैंने तुरंत ही हिसाब लगाकर बताया कि माह में बीस दिन अदालतों में काम होता है। इस तरह तो एक अदालत के पास कम से कम चार सौ और अधिक से अधिक पांच सौ मुकदमे होने चाहिए तभी ऐसा संभव है। आज हालत यह है कि एक-एक अदालत के पास चार-चार, पांच-पांच हजार मुकदमे लंबित हैं। वकील का कहना था कि इसी कारण से तो न्यायालय इतनी जल्दबाजी में होते हैं कि पूरी बात को सुनते तक नहीं। इससे न्याय पर प्रभाव पड़ रहा है। अदालतें सिर्फ आंकड़े बनाने में लगी हैं, न्याय ठीक से नहीं हो पा रहा है। होता भी है तो कोई उससे संतुष्ट नहीं है। लोगों को लगता है कि उनके साथ न्याय नहीं हो रहा है, जबकि एक सिद्धांत यह भी है कि न्याय होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए। अब आप ही सोचिए कि जब अदालतों के पास उनकी सामान्य क्षमता से पांच से दस गुना अधिक काम होगा तो वह किस तरह कर सकती हैं? इस लाचारी की उत्पत्ति सरकारों के कारण है जो पर्याप्त अदालतें स्थापित नहीं कर सकी हैं। (अनवरत ब्लॉग में जमील अहमद)
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Friday, January 21, 2011
न्यायपालिका भी दूध की धुली नहीं
विवेकाधीन शक्तियों के दुरुपयोग पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों के साथ-साथ न्यायपालिका को भी आड़े हाथ लिया। कोर्ट ने माना है कि इस मामले में न्यायपालिका भी दूध की धुली नहीं है। कोर्ट मध्य प्रदेश सरकार द्वारा भोपाल में कुशाभाई ठाकरे ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट को 2006 में भोपाल स्थित बेशकीमती 39 एकड़ भूमि आवंटन के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहा था। कोर्ट ने इस मामले में अधिकारियों के रवैए से भी नाराजगी जताते हुए सरकार को निर्देश दिया कि जमीन ट्रस्ट को सौंपे जाने से पहले इससे जुड़े सभी जरूरी दस्तावेज पेश किए जाएं। शीर्ष न्यायालय का कहना था कि शक्तियों के दुरुपयोग की बदतर स्थिति संभवत: आपातकाल के दौरान हुई, जब न्यायपालिका ने सरकार के कई गैरकानूनी कदमों पर अपनी मुहर लगाई थी। जिसमें 1976 में मौलिक अधिकारों को निलंबित करने के तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार के फैसले को पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने बरकरार रखना शामिल था। विवेकाधीन शक्तियों के दुरुपयोग के बाबत न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी और न्यायमूर्ति अशोक कुमार गांगुली की पीठ की टिप्पणी थी, हां, बदतर यहां से (शीर्ष न्यायालय) हुआ। इसकी शुरुआत सत्तर के दशक में हुई। ..वर्ष 1976 में और एक बार फिर 1986 में मारूति उद्योग का विवेकाधीन आवंटन राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष और यहां तक कि न्यायाधीशों को भी हुआ और इसे फैसले में बरकरार रखा गया। पीठ ने यह टिप्पणी तब की, जब वरिष्ठ अधिवक्ता रविशंकर प्रसाद ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट सहित सभी लोकतांत्रिक संस्थानों के मूल्यों में पतन हुआ है। जब पीठ ने सरकारी अधिकारियों द्वारा विवेकाधीन अधिकारों का दुरुपयोग करने पर नाराजगी जाहिर की।
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