राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने अपने अब तक के कार्यकाल में 13 दया याचिकाओं का निपटारा किया है। इनमें से सिर्फ तीन की सजा को बरकरार रखा, जबकि दस की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदला। राष्ट्रपति सचिवालय के पास 19 दया याचिकाएं अभी भी लंबित हैं, जिसमें संसद हमले के दोषी मो.अफजल का मामला भी शामिल हैं। सूचना अधिकार कार्यकर्ता सुभाष चंद्र अग्रवाल की आरटीआइ अर्जी से यह जानकारी सामने आई है। गृह मंत्रालय ने अग्रवाल को भेजे जवाब में कहा है कि राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने अपने चार साल दो माह के कार्यकाल (25 जुलाई 2007 से 20 सितंबर तक) में अभी तक 13 दया याचिकाओं का निपटारा किया है। इनमें से सिर्फ तीन को सजा माफी देने से मना किया है। पहला मामला असम के महेन्द्र नाथ दास का है, जिसने हत्या के मामले में जमानत मिलने के बाद एक और हत्या कर दी थी। दूसरा मामला खालिस्तानी आतंकी देवेन्द्र पाल सिंह भुल्लर का है, जिसने दिल्ली में बम विस्फोट कर नौ लोगों की हत्या कर दी थी। हमले में 29 अन्य लोग घायल भी हुए थे। राष्ट्रपति ने राजीव गाधी के हत्यारों मुरुगन, संथन और पेरारिवलन की दया याचिकाओं को भी खारिज कर दिया है। महामहिम ने परिवार के पांच सदस्यों की हत्या के आरोप में फांसी की सजा पाए तमिलनाडु के गोविंदसामी, उत्तर प्रदेश में सामूहिक नरसंहार के दोषी श्याम मनोहर, शिवराम, प्रकाश, सुरेश, रविंद्र और हरीश, यूपी में ही एक परिवार के पांच सदस्यों की हत्या के दोषी धर्मेद्र कुमार, नरेन्द्र यादव की सजा को उम्रकैद में बदल दिया। इसी प्रकार पंजाब में 17 लोगों की हत्या करने वाले पियारा सिंह, सरबजीत, गुरदेव और सतनाम सिंह, बिहार में आधा दर्जन के कत्ल के जिम्मेदार शोभित, तमिलनाडु में दस साल की बच्ची को अगवा करने के बाद मार डालने के दोषी मोहन गोपी, मध्य प्रदेश के स्कूली छात्रा की बलात्कार के बाद हत्या करने वाले एम.राम और संतोष, महाराष्ट्र में दो लोगों की हत्या के आरोप में फांसी की सजा पाए एस.बी. पिंगले की सजा को उम्रकैद में बदला।
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Friday, September 30, 2011
भुल्लर की दया याचिका पर आठ साल क्यों लगे
सुप्रीमकोर्ट ने फांसी की सजा पाए देवेन्द्र पाल सिंह भुल्लर की दया याचिका के निपटारे में 8 साल का समय लगने पर सरकार से जवाब मांगा है। इतना ही नहीं, अदालत ने फांसी की सजा पर हो रही राजनीति पर भी कड़ी टिप्पणियां की। भुल्लर 1993 के दिल्ली बम विस्फोट का दोषी है, जिसमें नौ लोगों की मौत हुई थी। भुल्लर को अदालत ने फांसी की सजा सुनाई थी। सुप्रीमकोर्ट तक से सजा पर मुहर लगने के बाद भुल्लर ने 2003 में राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका दाखिल की थी, जो 25 मई 2011 को खारिज हो गई। भुल्लर ने सुप्रीमकोर्ट में याचिका दाखिल कर देरी के आधार पर फांसी की सजा को उम्रकैद में बदलने का अनुरोध किया है। भुल्लर का 13 दिसंबर 2010 से मानव व्यवहार एवं संबद्ध विज्ञान संस्थान (इहबास) में इलाज चल रहा है। न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी की अध्यक्षता वाली पीठ ने बुधवार को भुल्लर की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एचपी रावल से कहा, सब जानना चाहते हैं कि 2003 से 2011 तक क्या हुआ। कोर्ट ने फांसी की सजा पर हो रही राजनीति पर तीखी टिप्पणियां करते हुए कहा,हम अपनी आंखें बंद कर लें, लेकिन दुर्भाग्य से अखबार पढ़ना नहीं बंद कर सकते। कुछ लोगों को समर्थन मिलता है, कुछ को नहीं। ये चीजें तब अहम हो जाती हैं जब दोषी को फांसी की सजा दी जाती है। कोर्ट ने कहा, वे सिर्फ संवैधानिक व कानूनी पहलू पर ही विचार कर सकते हैं। रावल ने कहा, देरी का कारण गृह मंत्रालय ही बता सकता है। भुल्लर की दया याचिका से संबंधित दस्तावेज गृह मंत्रालय को 27 मई 2003 को ही भेज दिये थे। मंत्रालय ने दिल्ली सरकार को 30 मई 2011 को पत्र भेज कर भुल्लर की दया याचिका खारिज होने की जानकारी दी। वे मंत्रालय से बात कर अदालत में हलफनामा दाखिल करेंगे। पीठ ने उनका बयान रिकार्ड करते हुए 10 अक्टूबर तक हलफनामा पेश करने को कहा। साथ ही मामले की सुनवाई के लिए 19 अक्टूबर की तिथि तय कर दी। इससे पहले भुल्लर के वकील केटीएस तुलसी से कहा,दिल्ली सरकार ने हलफनामा पेश किया है, पर देरी की वजह नहीं बताई है।
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