Friday, September 7, 2012

सुप्रीम कोर्ट से निरस्त कानून को दोबारा लाने की तैयारी



ठ्ठमाला दीक्षित, नई दिल्ली आरक्षण के मुद्दे पर सरकार एक बार फिर न्यायपालिका से रस्साकसी की तैयारी में है। प्रोन्नति में आरक्षण के जिस कानून को सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने छह साल पहले निरस्त कर दिया था। सरकार न सिर्फ हूबहू वही कानून दोबारा ला रही है, बल्कि उसे 1995 की उसी पिछली तिथि से लागू भी करना चाहती है। यह पहला मौका नहीं है जब सरकार कानून लाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को निष्प्रभावी कर रही है। इससे पहले भी ऐसा हो चुका है। आरक्षण के अलावा शाहबानो प्रकरण, चुनाव लड़ने से पहले उम्मीदवार का संपत्ति और आपराधिक ब्योरा देना आदि कुछ ऐसे मामले आए, जिनमें कभी सरकार ने अपने अधिकारों की क्षमता दिखाई तो कभी न्यायपालिका ने अपनी ताकत। अगर सिर्फ एससी-एसटी आरक्षण के मामले में सरकार और न्यायपालिका के बीच चली रस्साकसी पर निगाह डाली जाए तो साफ हो जाता है कि कितनी बार दोनों ने एक दूसरे के फैसलों को नकारा है। किस्सा शुरू होता है 1955 से जब एससी-एसटी के लिए प्रोन्नति में आरक्षण लागू हुआ, लेकिन 1992 में आरक्षण के मुद्दे पर आए इंद्रा साहनी फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रोन्नति में आरक्षण नहीं दिया जा सकता। इस फैसले से प्रोन्नति में आरक्षण समाप्त हो गया। सरकार ने 17 जून 1995 को संविधान में 77वां संशोधन कर अनुच्छेद 16 (4ए) जोड़ा और एससी-एसटी को प्रोन्नति में फिर आरक्षण दे दिया। इस संशोधन से कोर्ट का फैसला निष्प्रभावी हो गया। सरकार के गले में अभी भी एक फांस अटकी थी क्योंकि 10 फरवरी 1995 को सुप्रीम कोर्ट ने आरके सब्बरवाल के मामले में कहा कि एससी-एसटी वर्ग को परिणामी ज्येष्ठता (कांसीक्वेसियल सीनियरिटी) का लाभ नहीं मिलेगा। इस फैसले को निष्प्रभावी करने के लिए सरकार ने वर्ष 2001 में संविधान में 85वां संशोधन किया और अनुच्छेद 16 (4ए) में बदलाव करके प्रोन्नति में आरक्षण के साथ परिणामी ज्येष्ठता भी दे दी। आरक्षण के मुद्दे पर सरकार और न्यायपालिका के बीच टसल अभी खत्म नहीं हुई थी। एक अक्टूबर 1996 को एस विनोद कुमार के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि प्रशासनिक दक्षता बनाए रखने के लिए एससी-एसटी वर्ग को प्रोन्नति में चयन मापदंड के निर्धारित स्तर में कोई शिथिलता नहीं दी जा सकती। लेकिन सरकार ने इस फैसले को बेअसर करने के लिए वर्ष 2000 में 82वां संविधान संशोधन कर अनुच्छेद 335 में बदलाव किया। इसमें कहा कि प्रोन्नति के चयन मापदंड में शिथिलता दी जा सकती है। 19 अक्टूबर 2006 को एम. नागराज मामले में सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने एससी परिणामी ज्येष्ठता के साथ प्रोन्नति में आरक्षण देने के कानूनी प्रावधान को नकार दिया। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के आधार पर ही राजस्थान हाई कोर्ट और उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एससी-एसटी को प्रोन्नति में परिणामी ज्येष्ठता के साथ आरक्षण देने के राज्यों के कानून निरस्त कर दिए। उत्तर प्रदेश सरकार सुप्रीम कोर्ट आई और सुप्रीम कोर्ट ने 27 अप्रैल को यूपी पावर कारपोरेशन के मामले में एक बार फिर एम नागराज फैसले को आधार बनाते हुए हाई कोर्ट के आदेश पर अपनी मुहर लगा दी।



अपराधियों के चुनाव लड़ने पर विचार करेगा सुप्रीम कोर्ट



नई दिल्ली, प्रेट्र : सुप्रीम कोर्ट बुधवार को जनप्रतिनिधित्व कानून (आरपीए) के कुछ प्रावधान खत्म करने पर विचार के लिए सहमत हो गया। ये वे प्रावधान हैं जिनके जरिए पहले अपराधी रहे लोगों के दोष सिद्ध के बाद भी चुनाव लड़ने की संभावना बरकरार रहती है। याचिका पर अगली सुनवाई 10 अक्टूबर को होगी। न्यायमूर्ति अल्तमस कबीर और जे चेलेमेश्वर की पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता फली नरीमन से कहा, यह बहुत अहम मुद्दा है और हम इस पर विचार करना पसंद करेंगे। नरीमन याचिकाकर्ता लिली थॉमस की ओर से पेश हुए थे। 2005 में दर्ज इस याचिका पर कोर्ट ने पहले अटॉर्नी जनरल को नोटिस जारी किया था। याचि ने 1951 के जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 8,9 और 11 ए को रद करने की मांग की है। याचिका में कहा गया है कि यह संविधान के अनुच्छेद 84, 173 और 326 का उल्लंघन है, जिसमें अपराधियों के मतदाता के रूप में पंजीयन व सांसद-विधायक बनने पर पाबंदी है। आरपीए की धाराएं 8, 9 और 11 ए में दोषी करार लोगों को सजा के खिलाफ अपील या पुनर्विचार याचिका लंबित रहने तक विधायक-सांसद बने रहने की इजाजत देती हैं।
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Saturday, July 14, 2012

कन्या भ्रूण हत्याओं में दिल्ली में किसी को नहीं मिली सजा


सरकार के बेटी बचाओ अभियान के बावजूद राजधानी में छह वर्ष तक की बेटियों की संख्या में कमी जारी है। दिल्ली में नए कानून की चर्चा हो रही है। आश्चर्य की बात है कि सफलता के शिखर तक पहुंचने के बाद आज भी लोग बेटियों के प्रति नकारात्मक सोच से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए बनाया गया पीएनडीटी एक्ट दम तोड़ रहा है। कानून को धता बताकर लोग कन्या भ्रूण हत्या कर रहे हैं और कुछ डॉक्टर भी उनका साथ दे रहे हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार पूरे देश में 17 साल में सिर्फ 55 लोगों को इस एक्ट के उल्लंघन का दोषी पाया गया है। 902 लोगों के खिलाफ मुकदमे दर्ज हैं। दिल्ली सरकार के परिवार कल्याण विभाग की पहल पर पिछले दो महीने में इस एक्ट के तहत एक दर्जन क्लीनिकों के खिलाफ मुकदमे दर्ज किए गए हैं। सूत्रों की मानें तो एक्ट के उल्लंघन में 48 डॉक्टरों के खिलाफ मुकदमा चल रहा है। लेकिन दिल्ली में आज तक किसी को भी सजा नहीं हुई है। कानून का नहीं हो पा रहा सदुपयोग : पीएनडीटी एक्ट विषय पर शोध कर रही मनीषा भल्ला का कहना है कि गर्भ में बेटियां कमजोर मानसिकता की शिकार हो रही हैं। आज ग्रामीण क्षेत्र से ज्यादा शहरों में यह देखा जा रहा है। बेटी की पढ़ाई-लिखाई में हो रहे खर्च के बीच दहेज की चिंता शहरी मां-बाप को ज्यादा अखर रहा है। शहरों में स्वास्थ्य सुविधाएं तो बढ़ी हैं और इसका नतीजा है कि कन्या भ्रूण हत्या में भी इजाफा देखा जा रहा है। एक्ट मजबूत है, लेकिन इसे लागू करने में सरकार चूक जाती है। केवल डॉक्टर दोषी नहीं : दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. हरीश गुप्ता का कहना है कि हमारी तरफ से सभी को सख्त हिदायत दी गई है, जो भी इसका उल्लंघन करता पाया जाएगा उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। भ्रूण हत्या के पीछे अल्ट्रासाउंड मशीन का बढ़ता प्रयोग मुख्य वजह है। विशेषज्ञ डॉक्टर ही इस मशीन का उपयोग कर सकते हैं, लेकिन झोलाछाप डॉक्टर भी इसका प्रयोग कर रहे हैं। केवल डॉक्टरों को दोष देना उचित नहीं है। हम इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के साथ मिलकर बेटी बचाओ आंदोलन चला रहे हैं। हालांकि, आज तक एसोसिएशन की तरफ इस एक्ट का उल्लंघन करते हुए किसी डॉक्टर नहीं पकड़ा गया है। दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. एके वालिया ने कहा कि दिल्ली सरकार ने कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए सभी इंतजाम किए हैं। आरोपियों के खिलाफ कदम उठाए जा रहे हैं। कई मामलों में सरकार ने मुकदमे भी दर्ज किए हैं, लेकिन सरकारी कवायद से ज्यादा आम लोगों में भी यह जागरूकता जरूरी है कि बेटा और बेटी में कोई अंतर नहीं होता।

Thursday, July 5, 2012

तेजाब का दुरुपयोग रोकने पर सुप्रीम कोर्ट ने मांगा जवाब


सुप्री मकोर्ट ने तेजाब को हथियार के रूप में इस्तेमाल किए जाने, खासकर कथित व ठुकराए हुए प्रेमियों द्वारा युवतियों को इससे निशाना बनाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता जाहिर की है। शीर्ष अदालत ने सोमवार को गृह मंत्रालय से तेजाब बिक्री के नियमों को दुरुस्त करने के ठोस प्रयासों और प्रावधानों में बदलाव के संबंध में विस्तृत हलफनामा दाखिल करने को कहा है, ताकि तेजाब आसानी से अपराधियों को न मिल सके। न्यायमूर्ति आरएम लोढ़ा और एआर दवे की पीठ ने तेजाब हमले में बुरी तरह से जख्मी लक्ष्मी नामक लड़की की जनहित याचिका (2006 में दाखिल) पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। पीठ ने राज्य सरकारों व केंद्र शासित क्षेत्र के प्रशासकों से 11 फरवरी 2011 को जारी उस नोटिस का जवाब देने को कहा, जिसमें महिलाओं पर बढ़ते हमलों को रोकने के लिए तेजाब की बिक्री सीमित करने को कहा गया था। शीर्ष अदालत ने 29 अप्रैल 2012 को गृह मंत्रालय से कहा था कि वह राज्यों और केंद्रशासित क्षेत्रों के समन्वय से तेजाब बिक्री के बारे में ठोस योजना तैयार करे। पीठ ने केंद्र और राज्यों से जानना चाहा कि क्या उन्होंने तेजाब हमले से पीडि़त के उपचार और पुनर्वास के लिए समुचित मुआवजे की कोई अनुकूल योजना तैयार की है। केंद्र ने पूर्व में अदालत को बताया था कि इस मामले में विधि आयोग की रिपोर्ट सभी संबंधित पक्षों व महिला आयोग को भेजी गई है, ताकि सबके मशविरे से तेजाब हमले को गंभीर अपराध घोषित करने का कानून बन सके। ज्ञात हो, लक्ष्मी ने शीर्ष अदालत में याचिका दाखिल कर ऐसे मामले के निपटारे के लिए नया कानून बनाने या दंड संहिता, गवाह कानून और अपराध प्रक्रिया संहिता में संशोधन की मांग की है। याची का कहना है कि कानून ऐसा होना चाहिए जिसमें अपराधी को दंड और पीडि़त को मुआवजे की व्यवस्था हो। मालूम हो कि देश के विभिन्न राज्यों से युवतियों पर तेजाब फेंकने की घटना सुर्खियां बटोरती हैं। इसके खिलाफ फिलहाल कोई सख्त कानून नहीं होने के कारण आरोपी बेखौफ रहते हैं। सर्वोच्च न्यायालय के इस पहल से इस मामले के पीड़तों में न्याय मिलने की आस एक बार फिर से जागेगी। अभी तो यह देखना है कि केंद्र और राज्य सरकारों का इसपर क्या रुख रहता है।

Saturday, June 30, 2012

सिंगुर की जमीन टाटा से हारीं ममता


सिंगुर में नैनो कार कारखाने के लिए अधिग्रहीत जमीन विवाद में कलकत्ता हाई कोर्ट ने शुक्रवार को बंगाल की ममता सरकार को बड़ा झटका दिया। हाई कोर्ट ने टाटा के पक्ष में फैसला सुनाते हुए सिंगुर भूमि पुनर्वास व विकास अधिनियम 2011 को असंवैधानिक बताकर निरस्त कर दिया। इसके साथ ही हाई कोर्ट की खंडपीठ ने एकल पीठ के फैसले को खारिज कर दिया। जमीन हस्तांतरण पर भी रोक लगा दी गई है। ममता सरकार ने भी देर न करते हुए मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले जाने की घोषणा की है। कार परियोजना के लिए कुल अधिग्रहीत 997 एकड़ भूमि में से 400 एकड़ जमीन की टाटा से वापसी के लिए 14 जून, 2011 को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सिंगुर भूमि पुनर्वास व विकास अधिनियम विधानसभा में पास कराया था। जमीन का अधिग्रहण वाममोर्चा सरकार के कार्यकाल में हुआ था। भू अधिग्रहण के खिलाफ तृणमूल कांग्रेस ने बड़ा आंदोलन चलाया जिसके चलते कारखाना शुरू नहीं हो पाया और टाटा ने गुजरात के साणंद में नैनो कार का उत्पादन शुरू किया। न्यायाधीश पिनाकी चंद्र घोष व मृणालकांति चौधरी ने 250 पन्नों के फैसले में कहा, संविधान की धारा 254 के तहत सिंगुर अधिनियम असंवैधानिक है। पीठ ने वर्ष 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून का हवाला देते हुए कहा, जमीन अधिग्रहण संबंधी किसी भी प्रकार का कानून बनाने के लिए राष्ट्रपति का अनुमोदन अनिवार्य है लेकिन अनुमोदन प्राप्त नहीं किया गया। 28 सितंबर, 2011 को हाई कोर्ट की एकल पीठ के न्यायाधीश इंद्रप्रसन्न मुखर्जी के फैसले को खारिज करते हुए खंडपीठ ने कहा, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार किसी भी अधीनस्थ कोर्ट के पास यह अधिकार नहीं है कि भूमि संबंधी किसी कानून में संशोधन कर मुआवजा देने का प्रावधान संलग्न करा सके। उल्लेखनीय है कि जज इंद्रप्रसन्न मुखर्जी ने सिंगुर एक्ट को पूर्णत: संवैधानिक व सही होने का फैसला सुनाया था। फैसला सुनाने वाली खंडपीठ में सिंगुर को लेकर कुल 34 मामले दायर किए गए थे। इनमें से दो टाटा मोटर्स व 32 वेंडरों की ओर से थे। दरअसल, सत्ता में आते ही ममता बनर्जी ने भूमि वापसी संबंधी अधिनियम बनाकर किसानों को उनकी जमीन लौटाने की प्रक्रिया काफी तेजी से लागू करने की कोशिश की थी। चंद रोज में ही हुगली जिला प्रशासन ने जमीन वापसी की प्रक्रिया शुरू कर दी थी लेकिन मामला कोर्ट में जाने से यह प्रक्रिया लटकी रह गई। संविधान विरोधी कानून बनाया : हाई कोर्ट भू-अधिग्रहण कानून संविधान की संयुक्त सूची में है, लिहाजा इस तरह कोई राज्य कानून नहीं बना सकता। सिंगुर एक्ट में राष्ट्रपति का अनुमोदन नहीं लिया गया। अत: यह संविधान विरोधी है। पूरी ताकत से लड़ेंगे किसानों की लड़ाई : ममता मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी कहा है कि ताजा फैसले से सरकार की इच्छा पर फर्क नहीं पड़ा है, वह पूरी ताकत से किसानों को न्याय दिलाने की लड़ाई लड़ेगी। मामले में बंगाल सरकार की पैरवी कर रहे अधिवक्ता व तृणमूल सांसद कल्याण बनर्जी ने साफ कर दिया कि फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की जाएगी।

Saturday, June 23, 2012

सिंगुर की जमीन टाटा से हारीं ममता


सिंगुर में नैनो कार कारखाने के लिए अधिग्रहीत जमीन विवाद में कलकत्ता हाई कोर्ट ने शुक्रवार को बंगाल की ममता सरकार को बड़ा झटका दिया। हाई कोर्ट ने टाटा के पक्ष में फैसला सुनाते हुए सिंगुर भूमि पुनर्वास व विकास अधिनियम 2011 को असंवैधानिक बताकर निरस्त कर दिया। इसके साथ ही हाई कोर्ट की खंडपीठ ने एकल पीठ के फैसले को खारिज कर दिया। जमीन हस्तांतरण पर भी रोक लगा दी गई है। ममता सरकार ने भी देर न करते हुए मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले जाने की घोषणा की है। कार परियोजना के लिए कुल अधिग्रहीत 997 एकड़ भूमि में से 400 एकड़ जमीन की टाटा से वापसी के लिए 14 जून, 2011 को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सिंगुर भूमि पुनर्वास व विकास अधिनियम विधानसभा में पास कराया था। जमीन का अधिग्रहण वाममोर्चा सरकार के कार्यकाल में हुआ था। भू अधिग्रहण के खिलाफ तृणमूल कांग्रेस ने बड़ा आंदोलन चलाया जिसके चलते कारखाना शुरू नहीं हो पाया और टाटा ने गुजरात के साणंद में नैनो कार का उत्पादन शुरू किया। न्यायाधीश पिनाकी चंद्र घोष व मृणालकांति चौधरी ने 250 पन्नों के फैसले में कहा, संविधान की धारा 254 के तहत सिंगुर अधिनियम असंवैधानिक है। पीठ ने वर्ष 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून का हवाला देते हुए कहा, जमीन अधिग्रहण संबंधी किसी भी प्रकार का कानून बनाने के लिए राष्ट्रपति का अनुमोदन अनिवार्य है लेकिन अनुमोदन प्राप्त नहीं किया गया। 28 सितंबर, 2011 को हाई कोर्ट की एकल पीठ के न्यायाधीश इंद्रप्रसन्न मुखर्जी के फैसले को खारिज करते हुए खंडपीठ ने कहा, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार किसी भी अधीनस्थ कोर्ट के पास यह अधिकार नहीं है कि भूमि संबंधी किसी कानून में संशोधन कर मुआवजा देने का प्रावधान संलग्न करा सके। उल्लेखनीय है कि जज इंद्रप्रसन्न मुखर्जी ने सिंगुर एक्ट को पूर्णत: संवैधानिक व सही होने का फैसला सुनाया था। फैसला सुनाने वाली खंडपीठ में सिंगुर को लेकर कुल 34 मामले दायर किए गए थे। इनमें से दो टाटा मोटर्स व 32 वेंडरों की ओर से थे। दरअसल, सत्ता में आते ही ममता बनर्जी ने भूमि वापसी संबंधी अधिनियम बनाकर किसानों को उनकी जमीन लौटाने की प्रक्रिया काफी तेजी से लागू करने की कोशिश की थी। चंद रोज में ही हुगली जिला प्रशासन ने जमीन वापसी की प्रक्रिया शुरू कर दी थी लेकिन मामला कोर्ट में जाने से यह प्रक्रिया लटकी रह गई। संविधान विरोधी कानून बनाया : हाई कोर्ट भू-अधिग्रहण कानून संविधान की संयुक्त सूची में है, लिहाजा इस तरह कोई राज्य कानून नहीं बना सकता। सिंगुर एक्ट में राष्ट्रपति का अनुमोदन नहीं लिया गया। अत: यह संविधान विरोधी है। पूरी ताकत से लड़ेंगे किसानों की लड़ाई : ममता मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी कहा है कि ताजा फैसले से सरकार की इच्छा पर फर्क नहीं पड़ा है, वह पूरी ताकत से किसानों को न्याय दिलाने की लड़ाई लड़ेगी। मामले में बंगाल सरकार की पैरवी कर रहे अधिवक्ता व तृणमूल सांसद कल्याण बनर्जी ने साफ कर दिया कि फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की जाएगी।

Wednesday, May 23, 2012

आधी संपत्ति का हक

बृहस्पतिवार को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में हिंदू विवाह (संशोधन) विधेयक 2010 संबंधी संशोधन को मंजूरी दे दी गई जो पूरी तरह महिलाओं के हक में दिखता है। ताजा संशोधन के तहत अब तलाक की स्थिति में पत्नी पति की अचल आवासीय संपत्ति में आधी की हकदार होगी जिसके लिए वह तलाक के बाद आवेदन कर सकती है। तलाक की अर्जी के बाद सोच-विचार के लिए दिया जाने वाला छह माह का समय भी दोनों पक्षों की सहमति के बिना खत्म या कम नहीं किया जा सकता है। तलाक जैसे कानून पर किसी भी तरह के संशोधन की स्थिति में स्त्री के पक्ष से विचार किया जाना सबसे पहली शर्त होनी ही चाहिए क्योंकि जिस स्त्री स्वावलंबन की दुहाई देते हुए तलाक के नियमों को आसान बनाने की पैरवी हो रही है, समाज में वह प्रतिशत बहुत कम है। आज भी अधिसंख्य महिलाएं आर्थिक रूप से पति पर निर्भर हैं। यही नहीं, कई मामलों में घर-परिवार में संतुलन बिठाने और बच्चों की परवरिश के नाम पर अनेक महिलाएं नौकरी छोड़ देती हैं। लिहाजा पति को आसानी से तलाक की सुविधा मुहैया करा दी जाएगी तो पुरुष वृत्ति के चलते वह एक के बाद एक तलाकशुदाओं की जमात खड़ी करने से नहीं हिचकेगा। इसके उलट तलाक के बाद पत्नी को आधी संपत्ति देने के नाम से ही अदालतों में तलाक के मामलों पर अंकुश लग जाएगा। महिला और बच्चों के आर्थिक सामाजिक हितों के मद्देनजर ही सरकार द्वारा हिंदू विवाह अधिनियम के तहत तलाक के नियम आसान नहीं रखे गये हैं। दोनों की सहमति के बिना पति-पत्नी कानूनी रूप से अलग नहीं हो सकते हैं। आर्थिक और सामाजिक उदारीकरण के इस दौर में अपवादों को छोड़कर हमारा सामाजिक ढांचा आज भी उस सीमारेखा को पार नहीं कर पाया है जहां तलाक लेने या पत्नी की मृत्यु के थोड़े दिनों बाद पुरुष दूसरा विवाह कर अपना सुख-चैन वापस पा लेता है जबकि पत्नी जीवनभर वैधव्य या तलाकशुदा का कलंक अपने माथे पर ढोती फिरती है। इस लिहाज से स्त्री की आर्थिक सुरक्षा सरकार की चिंता का विषय होना ही चाहिए और मौजूदा विधेयक में उसकी यह चिंता जाहिर हुई है। इस मामले में दूसरा पक्ष भी विचारणीय है कि आज क्योंकि पुरुष के समानांतर स्त्री भी आर्थिक स्वावलम्बन की डगर पर आगे बढ़ रही है लिहाजा वह पति का उस रूप में विरोध करने का माद्दा रखने लगी है जहां पुरुष होने के नाते वह सदियों से उस पर हावी रहा है। यही कारण है कि वैवाहिक रिश्तों में खटास इस कदर बढ़ती दिख रही है कि छोटे-मोटे झगड़ों में भी नौबत तलाक तक पहुंच जाती है। ऐसी पारिवारक स्थितियां भविष्य में एक पंगु समाज का ही निर्माण करेंगी लिहाजा माना जा रहा है कि यदि पति-पत्नी की सहमति है और उनका दांपत्य जीवन अब किसी भी रूप में पटरी पर नहीं आ सकता है तो दोनों का अलग हो जाना ही परिवार और समाज के हित में उचित है। इसी सोच के चलते सरकार हिंदू विवाह (संशोधन) विधेयक 2010 के तहत तलाक के कानून को थोड़ा लचीला बनाना चाहती है ताकि अदालतों में लंबित मामलों का निस्तारण हो सके और दो स्वतंत्र व्यक्तित्व अपनी तरह से जी सकें लेकिन लोकसभा में पारित उक्त संशोधन विधेयक गत तीन मई को राज्यसभा में विपक्ष और सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे दलों के तीखे विरोध के कारण पारित नहीं हो सका था।